Showing posts with label Article. Show all posts
Showing posts with label Article. Show all posts

Sunday, September 6, 2020

गुरू के ज्ञान बिन मंजिल, न मिलती जिंदगानी में, गुरू ही मार्ग दर्शक है, जिंदगी की कहानी में : रामसनेही "सजल"

 


मित्रो, 

सभी आदरणीय गुरुजनों को सादर नमन 

करता हूँ और इस परम पुनीत दिवस के पर 

सभी को बधाई एवं सुभकामनाएँ देता हूँ  l

शिक्षक दिवस पर  कुछ पंक्तियाँ लिखने का प्रयास  कर रहा हूँ l

**************************************

गुरू के ज्ञान बिन मंजिल, न मिलती जिंदगानी में, 

गुरू ही मार्ग दर्शक है,  जिंदगी की कहानी में l


गुरू  होता पिता  भी है, गुरू माता भी  होता है, 

गुरू पतवार  जीवन की, पड़ी मुश्किल में खेता है l


गुरू के  रूप में   पहली गुरू माता ही होती  है, 

हमारी जिंदगी के  हर,  कदम पर  साथ देती है  l


हमारे लब्ज से माँ  बोलना,  वो ही सिखाती है, 

दूसरा शब्द  पापा के  लिए कहना सिखाती है l


हमारे नन्हे हाथों को पकड़ कर घर के आँगन में, 

कदम के बाद फिर दूजा कदम रखना सिखाती है l







हमारे संस्कारों को,  हमारी जिंदगी में  लाकर 

हमें दिनरात उठना बैठना,  चलना सिखाती है l


गुरू के रूप में दूजा  गुरू अपना  पिता होता, 

हमारी जिंदगी की मंजिलों की तस्बीर है होता l


स्वयं अपने छिपा दर्दों को मेरे ख्वाब बोता है, 

हमारी राँह के  काँटे  स्वयं  ही वो हटाता  है l


गुरू के रूप में तीजा गुरू गुरुकुल में मिलता है, 

हमारे ज्ञान के  आधार का  वो आयाम होता है l


सार्थक  जिंदगी के  मंत्र  सारे वो बताता   है, 

सफलता हर कदम चूमे, यही आशीष देता है l


स्वयं श्रीराम भी गुरू आश्रम में जाके सीखे थे, 

गुरु की ही कृपा से तो धनुष औ बाण सीखे थे l


पिता, माता, प्रजा के प्रति उचित सम्मान सीखे थे, 

धर्म के प्रति उचित  सम्मान आदर भाव सीखे थे l


गुरू संदीपनी के आश्रम में जाकर  के गिरधर ने, 

स्वयं जीवन कला के साथ हर संस्कार सीखे थे l


स्वयं बनकर गुरु अर्जुन के गीता को सुनाया था, 

अधर्मी कौरवों का कुल समूचा ही मिटाया  था l


अगर होते नहीं चाणक्य जैसे  मौर्य के गुरवर, 

हमारे देश  के  इतिहास  में बदलाव  न होता  l


स्वर्ण युग रूप में उस काल का इतिहास न होता, 

विदेशी कुछ  लुटेरों का यहाँ भय काल ही होता l


गुरु स्थान तो  भगवान से भी बढ़ के होता है, 

गुरू ही मुक्ति पाने का प्रमुख आयाम होता है l


ॐ जय गुरुवे  नमः.......... 


.................................रामसनेही " सजल "

Saturday, August 29, 2020

बहुत याद आता है, वो गांवों का रहना , वो गांवो की गलियों में मिलना बिछड़ना " सजल "

 *************************************


मित्रो, 

हमारे देश की आत्मा गावों में बसती है, 

हम चाहे जितना पढ़ लिख कर, ढेर सारा 

पैसा कमा कर, ऊँचे ऊँचे भवन बना कर 

शहर में सारे एसो आराम के साथ भले ही 

जीवन ब्यतीत कर रहें हों मगर वो गावों में 

में गुजरे हुए बचपन के दिन कहीं न कहीं 

हमारे दिल में मन में याद आते रहते हैँ l

उन्ही यादों पर एक कविता लिखने का 

प्रयास कर रहा हूँ :


*******************************

बहुत याद आता है,  वो  गांवों का रहना ,

वो गांवो की गलियों में मिलना बिछड़ना I  


ये वारिस की बूंदों का, रिमझिम बरसना, 

वो कोयल के गीतों की धुन पर थिरकना I

वो पपीहे की बोली पे,  दिल का धड़कना,    

वो सूरज का वारिद में छिपना निकलना I


बहुत याद आता है,  वो  गांवों का रहना ,

वो गांवो की गलियों में मिलना बिछड़ना I  


वो सूरज  की गर्मी से तन का यूँ तपना,

वो ओंठो पे पानी की  बूंदों का पड़ना I

वो पशुओं का तालो के जल में मचलना, 

खेतों की फसलों को पशुओं  का चरना I  


बहुत याद आता है,  वो  गांवों का रहना ,

वो गांवो की गलियों में मिलना बिछड़ना I  


वो गांवों की गलियों में किचकिच का होना,

वो मेढक की टर-टर का पग पग पे होना I     

वो हवाओं के झोंके से तन मन  सिहरना, 

वो बखरी के छत पर से छप्पर सरकना  I  


बहुत याद आता है,  वो  गांवों का रहना ,

वो गांवो की गलियों में मिलना बिछड़ना I  


वो रातों में खटिया के खटमल का कटना, 

वो पाती के छपरों से  बूंदों का टपकना I  

वो रातों में बिस्तर पर करवट  बदलना, 

वो  रातों में जग जग के ही  रात कटना I


बहुत याद आता है,  वो  गांवों का रहना ,

वो गांवो की गलियों में मिलना बिछड़ना I  


वो खेतों के मेड़ों पे बच बच के चलना,

वो गड्ढो में पैरों का हर पल फिसलना I

वो हांथो में लाठी को संग ले निकलना 

वो पानी से बच कर किनारे निकलना I   


बहुत याद आता है,  वो  गांवों का रहना ,

वो गांवो की गलियों में मिलना बिछड़ना I  


वो बाग़ों में पेड़ों  पर  चढ़ना फिसलना,

वो डालों के बीचों  में जाकर लटकना I    

वो पंक्षी के झुंडो को छुप कर पकड़ना,   

वो जामुन के बीजों का पूरा निगलना I 


बहुत याद आता है,  वो  गांवों का रहना ,

वो गांवो की गलियों में मिलना बिछड़ना I  


वो छतरी को, बाजार लेकर निकलना,

वो चप्पलों हवाई पहन कर निकलना I   

वो बदरी लपकती, हवाओं का बहना,

वो खंती या नाले से बच कर निकलना I   


बहुत याद आता है,  वो  गांवों का रहना ,

वो गांवो की गलियों में मिलना बिछड़ना I  


वो  मैय्या का आँगन मेंi सजना सवरना,

वो उलझे से बालों  में कंघी  झटकना I 

वो टूटे से  दर्पण में खुद को निहारना,

वो पीछे से बहना का उनसे चिपकना I  


बहुत याद आता है,  वो  गांवों का रहना ,

वो गांवो की गलियों में मिलना बिछड़ना I  


वो रातों में मैय्या के आँचल में  छिपना,  

वो परियों की मीठी कहानी का सुनना l

तितली का आँगन के कोने   में उड़ना, 

वो चिड़ियों का आकर सुबेरे  चहकना 


बहुत याद आता है,  वो  गांवों का रहना ,

वो गांवो की गलियों में मिलना झगड़ना I  


वो धानों में बाली का छिपकर निकलना,   

वो खेतों में खुसबू का चहुदिश महकना,

वो मक्के के  भुट्टों का खेतों में  पकना,

वो गन्नों के  खेतों में हिरणों का चरना I  


बहुत याद आता है,  वो  गांवों का रहना ,

वो गांवो की गलियों में मिलना झगड़ना I  


वो कागज की कस्ती का नलियों में बहना,

वो माटी की गाड़ी का गलियों में चलना I  

वो खड़िया की माटी से पाटी पे लिखना,    

वो गिनती पहाड़े का  दिन रात  रटना I

 

बहुत याद आता है,  वो  गांवों का रहना ,

वो गांवो की गलियों में मिलना झगड़ना I


वो गुड़ियों का गुड्डो के संग ब्याह रचना, 

वो राज का रानी से  मिलना  बिछड़ना l

वो परियों का सपनो मे हर रोज  आना, 

वो तारों की दुनिया मे हर  रोज  जाना l


बहुत याद आता है,  वो  गांवों का रहना ,

वो गांवो की गलियों में मिलना झगड़ना I


वो सावन में  बागों में  झूलों  का पड़ना, 

वो कजरी के गीतों का हर रोज सुनना l

वो आल्हा की गीतों पे ढोलक का बजना, 

वो सावन के मेलों में मिलना बिछड़ना l


बहुत याद आता है,  वो  गांवों का रहना ,

वो गांवो की गलियों में मिलना झगड़ना I

.................... रामसनेही " सजल "

Tuesday, September 17, 2019

जरूरी हो गया था अनुच्छेद 370 के नासूर का इलाज

मौलाना मेराज अहमद 'कमर'
अगस्त महीने की पांच तारीख कई मायने में ऐतिहासिक बन गई। इस दिन भारत और भारतीयों के लिए 70 साल से नासूर बन चुके कश्मीर संबंधी भारतीय संविधान की अस्थाई अनुच्छेद 370 के उन सारे प्राविधानों खत्म कर दिया गया, जिससे कश्मीर भारत का अभिन्न अंग होते हुए भी पराये जैसा प्रतीत होता था। इस संबंध में गृहमंत्री अमित शाह ने सही कहा है कि कश्मीर का अधूरा विलय अब जाकर पूरा हुआ। इससे पहले देश विरोधी गतिविधियों का केन्द्र बन चुके कश्मीर में भारत सरकार चाह कर भी कोई जनकल्याणकारी योजना नहीं लागू कर सकती थी। वोट बैंक की राजनीति ने पड़ोसी पाकिस्तान को अपरोक्ष रूप से कश्मीर में पांव पसारने का मौका देता था। भारतीय तिरंगे का अपमान करने और भारत तेरे टुकड़े होंगे की गूंज अक्सर कश्मीर की गलियों से सुनी जा सकती थी। आखिरकार भारत सरकार ने पांच अगस्त को संसद में जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन विधेयक पेश कर कश्मीर पर लगे बदनुमा दाग और नासूर के रूप में अनुच्छेद 370 को एक झटके में खत्म कर दिया। अब जम्मू-कश्मीर भी राजधानी दिल्ली की तरह केन्द्र शासित प्रदेश होगा, जहां विधायिका तो होगी, लेकिन केन्द्र के प्रतिनिधि के रूप में नियुक्त उपराज्यपाल को मुख्यमंत्री से अधिक अधिकार हासिल होंगे। जम्मू-कश्मीर से लद्दाख को अलग कर एक और नया केन्द्र शासित प्रदेश बनाया गया। अब लद्दाख में चंडीगढ़ की तरह उपराज्यपाल का शासन होगा। सरकार ने लद्दाख वासियों की वर्षों पुरानी मांग को इस विधेयक के जरिये पूरा कर दिया। अब जम्मू-कश्मीर में भी हर पांच वर्ष में चुनाव हुआ करेंगे। वहां भी भारत सरकार की सभी जनकल्याणकारी योजनाएं निर्वाध रूप से लागू हुआ करेंगी। 370 के अंतर्गत 35ए हटने के कारण अब शिक्षा और रोजगार के भी नये-नये प्लेटफार्म तैयार होंगे। रक्षामंत्री राजनाथ सिंह का यह कहना कि अब बात सिर्फ पाक अधिकृत कश्मीर की होगी, पड़ोसी पाकिस्तान को भी अपनी हरकत से बाज आने के लिए सीमारेखा तय करने जैसा है। स्पष्ट है कि पाकिस्तान में कश्मीर के एक हिस्से पर बड़ी धूर्तता के साथ अवैध कब्जा बनाये रखा है और आजाद कश्मीर का छलावा बनाकर वहां अपने आतंकी अड्डों को खाद-पानी देने का काम कर रहा है। ये आतंकी अड्डे भारत में अशांति फैलाने का कार्य कर रहे हैं। अभी फरवरी माह में एयर स्ट्राइक के माध्यम से भारत ने इन अड्डों को काफी हद तक नष्ट करने का कार्य किया।
गौरतलब है कि 15 अगस्त 1947 को भारत को मिली आजादी के बाद 26 अक्टूबर 1947 को जम्मू और कश्मीर के तत्कालीन शासक महाराजा हरिसिंह ने अपनी रियासत का भारत में विलय के लिए विलय-पत्र पर दस्तखत किए थे। गवर्नर जनरल माउंटबेटन ने 27 अक्टूबर को इसे मंजूरी दी। न इसमें कोई शर्त शुमार थी और न ही रियासत के लिए विशेष दर्जे जैसी कोई मांग। इस वैधानिक दस्तावेज पर दस्तखत होते ही समूचा जम्मू और भारत का अभिन्न अंग बन गया, इसमें पाक अधिकृत कश्मीर भी शामिल था। इसके बाद 17 अक्टूबर 1949 को एक ऐसी घटना घटी, जिसने जम्मू और कश्मीर का इतिहास बदल दिया। संसद में गोपाल स्वामी अयंगर ने खड़े होकर कहा कि हम जम्मू और कश्मीर को नया आर्टिकल देना चाहते हैं। उन्होंने दलील दी कि आधे कश्मीर पर पाकिस्तान ने कब्जा कर लिया है और इस राज्य के साथ समस्याएं हैं। आधे लोग उधर फंसे हुए हैं और आधे इधर तो अभी वहां की स्थिति अन्य राज्यों की अपेक्षा अलग है। ऐसे में वहां के लिए फिलहाल नए आर्टिकल की जरूरत होगी, क्योंकि अभी जम्मू और कश्मीर में पूरा संविधान लागू करना संभव नहीं होगा। अंततः अस्थायी तौर पर उसके लिए 370 लागू करना होगा। जब वहां हालात सामान्य हो जाएंगे, तब इस अनुच्छेद को भी हटा दिया जाएगा। उल्लेखनीय है कि सबसे कम समय में डिबेट के बाद यह अनुच्छेद संसद में पास हो गया। यह संविधान में सबसे आखिरी में जोड़ी गई अनुच्छेद थी। इस अनुच्छेद के फेस पर भी लिखा है कि ‘टेम्परेरी प्रोविजन फॉर द स्टेट ऑफ द जम्मू एंड कश्मीर’।
इस अनुच्छेद को जोड़ने के पीछे एक धारणा यह भी थी कि धरती के जन्नत कश्मीर को जहन्नुम बनने से रोका जा सकेगा। कश्मीर की कश्मीरियत पर कोई बदनुमा दाग लगने से बचाया जा सकेगा। कश्मीरी संस्कृति की रक्षा की जा सकेगी। यही सोच आगे चलकर उल्टी साबित हुई और भारत के लिए नासूर बन गया। दो संविधान, दो विधान और दो सरकार ने कश्मीर में कुछ इस तरह से तबाही मचाई कि अब तक न जाने कितने जवान शहीद हो चुके है, न जाने कितनी मांगे सूनी हो चुकी हैं, न जाने कितने घरों के चिराग बुझ चुके हैं। कश्मीर अलगाववादियों के अड्डे बन गये। जन्नत समझी जाने वाली कश्मीरी धरती जहन्नुम में बदल चुकी थी। अलगाववादी तो दूर मुख्य अनुच्छेद की महबूबा मुफ्ती जैसी कश्मीरी नेता का यह कहना कि 370 के छेड़छाड़ से कश्मीर को कोई तिरंगा उठाने वाला नहीं बचेगा। उमर अब्दुल्ला का यह कहना कि 370 के साथ कश्मीर का भी रिश्ता भारत के साथ खत्म हो जायेगा। 370 की गंभीरता को बताने के लिए काफी है। 370 के अधिकारों का दुरूपयोग कर वहां के अलगाववादियों ने खून की नदियां बहाई। निर्दोष कश्मीरी पण्डितों को अपना घर-बार छोड़ना पड़ा। उनकी इज्जत आबरू भी रूसवां हुई। धीरे-धीरे भारतीय सेना पर पत्थरबाजी और आतंकवादियों के के लिए सुरक्षाकवच बनाने का कार्य किया जाने लगा। दुर्भाग्य से वोट बैंक की राजनीति ने इस स्थिति को देखकर भी अनदेखा करने का कार्य किया। नतीजा 370 का नासूूर बड़ा, और बड़ा होता गया।
फिलहाल अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद जम्मू-कश्मीर में बकरीद का त्यौहार जिस तरह लगभग शांतिपूर्ण तरीके से मनाया गया, वह उल्लेखनीय है और हालात सुधरने का भरोसा बढ़ाने वाला भी। यह सही है कि जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 के हटने के बाद इस राज्य में शांति बनाए रखने के लिए सुरक्षा के अतिरिक्त इंतजाम किए गए हैं और यह स्वाभाविक भी है, लेकिन महत्वपूर्ण यह है कि राज्य के लोग बदली हकीकत को स्वीकार करते नजर आ रहे हैं और इस तथ्य के प्रति भी उनकी समझ बढ़ती जा रही है कि जो कुछ किया गया है, वह कश्मीर और वहां के लोगों के हित में है। अनुच्छेद 370 की समाप्ति न केवल जम्मू-कश्मीर के शेष देश के साथ एकीकरण के लिए आवश्यक थी, बल्कि उसके तेज विकास के लिए भी ऐसा करना अनिवार्य था। यह हालात में आ रहे बदलाव का ही प्रमाण है कि पिछले तीस साल में कश्मीर में पहली बार बकरीद के मौके पर हिंसा की कोई बड़ी घटना नहीं हुई। कश्मीर की नई हकीकत पाकिस्तान को भी स्वीकार करनी होगी और अंतरराष्ट्रीय मीडिया को भी। इस मामले में विपक्ष को भी कश्मीर की संवेदनशीलता को समझनी होगा। कश्मीर अन्य राज्यों जैसा नहीं था। वहां का दो संविधान और दो विधान के चलते स्थिति हमेशा से असहज थी। उस पर पाकिस्तान पोषित आतंकवाद के चलते कश्मीर के अन्दर जो खून-खराबा होता रहा है, उससे बहुत जल्दी निजात मिलना मुश्किल है। अचानक 370 खत्म किये जाने से तिलमिलाया पाकिस्तान इसी ताक में है कि उसे भारत की तरफ से कुछ कमी मिल जाये, जिसे वह अन्तराष्ट्रीय स्तर पर भारत के खिलाफ दुष्प्रचार फैलाने में इस्तेमाल करे। हालांकि अभी तक भारत के इस कदम पर वैश्विक स्वीकृति मिली है। केवल चीन और तुर्की को छोड़कर विश्व के प्रायः सभी देशों ने भारत के इस कदम पर सकारात्मक प्रतिक्रिया दी है।
सरकार के इस फैसले से असहमति जताने वालों को कश्मीर के सही इतिहास को समझना होगा और वर्तमान को भी। अंतरराष्ट्रीय मीडिया का जो वर्ग कश्मीर को पाकिस्तान के नजरिये से देख रहा है, वह मुगालते में है। कश्मीर हमेशा से भारत का अभिन्न अंग रहा है- अनुच्छेद 370 के साथ भी और उसके बिना भी। अनुच्छेद 370 कश्मीर के भारत में एकीकरण को एक संवैधानिक-कानूनी रूप देने की कोशिश से अधिक नहीं था। हैरानी नहीं कि इस प्रावधान से सबसे अधिक लाभ उन स्थानीय नेताओं और उनके परिवारों को ही हुआ, जिन्होंने कश्मीर को हमेशा अपनी निजी जागीर की तरह देखा। कश्मीर के संदर्भ में अंतरराष्ट्रीय मीडिया की आधी-अधूरी जानकारी का कारण यह है कि वह वास्तविक रिपोर्टिंग से दूर है। राज्य में अशांति की दो-चार घटनाओं को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर जिस तरह की तस्वीर प्रस्तुत करने की कोशिश की जाती है, वह जमीनी हकीकत से कोसों दूर होती है। अंतरराष्ट्रीय मीडिया को यह सच भी स्वीकार करना होगा कि कश्मीर के एक बड़े हिस्से पर पाकिस्तान ने गलत तरीके से कब्जा कर रखा है। यह उचित है कि केंद्र सरकार के स्तर पर यह संकेत दिए जा रहे हैं कि अब पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले कश्मीर को वापस लेने के लिए प्रयास किए जाएंगे।

Sunday, September 15, 2019

समय के साथ बदल जाइये ज़नाब

`#परिवर्तन संसार का नियम हैं

``1998 में Kodak में 1,70,000 कर्मचारी काम करते थे और वो दुनिया का 85% फ़ोटो पेपर बेचते थे..चंद सालों में ही Digital photography ने उनको बाज़ार से बाहर कर दिया.. Kodak दिवालिया हो गयी और उनके सब कर्मचारी सड़क पे आ गए।

HMT (घडी)
BAJAJ (स्कूटर)
DYNORA (टीवी)
MURPHY (रेडियो)
NOKIA (मोबाइल)
RAJDOOT (बाईक)
AMBASDOR (कार)
DINESH  (कपड़ा)

मित्रों,
इन सभी की गुणवक्ता में कोई कमी नहीं थी फिर भी बाजार से बाहर हो गए!!
कारण???
उन्होंने समय के साथ बदलाव नहीं किया.!!

आपको अंदाजा है कि आने वाले 10 सालों में दुनिया पूरी तरह बदल जायेगी और आज चलने वाले 70 से 90% उद्योग बंद हो जायेंगे।

चौथी औद्योगिक क्रान्ति में आपका स्वागत है...

Uber सिर्फ एक software है। उनकी अपनी खुद की एक भी Car नहीं इसके बावजूद वो दुनिया की सबसे बड़ी Taxi Company है।

Airbnb दुनिया की सबसे बड़ी Hotel Company है, जब कि उनके पास अपना खुद का एक भी होटल नहीं है।

Paytm, ola cabs , oyo rooms जैसे अनेक उदाहरण हैं।

US में अब युवा वकीलों के लिए कोई काम नहीं बचा है, क्यों कि IBM Watson नामक Software पल भर में ज़्यादा बेहतर Legal Advice दे देता है। अगले 10 साल में US के 90% वकील बेरोजगार हो जायेंगे... जो 10% बचेंगे... वो Super Specialists होंगे।

Watson नामक Software मनुष्य की तुलना में Cancer का Diagnosis 4 गुना ज़्यादा Accuracy से करता है। 2030 तक Computer मनुष्य से ज़्यादा Intelligent हो जाएगा।

अगले 10 सालों में दुनिया भर की सड़कों से 90% cars गायब हो जायेंगी... जो बचेंगी वो या तो Electric Cars होंगी या फिर Hybrid...सडकें खाली होंगी,Petrol की खपत 90% घट जायेगी,सारे अरब देश दिवालिया हो जायेंगे।

आप Uber जैसे एक Software से Car मंगाएंगे और कुछ ही क्षणों में एक Driverless कार आपके दरवाज़े पे खड़ी होगी...उसे यदि आप किसी के साथ शेयर कर लेंगे तो वो ride आपकी Bike से भी सस्ती पड़ेगी।

Cars के Driverless होने के कारण 99% Accidents होने बंद हो जायेंगे.. इस से Car Insurance नामक धन्धा बंद हो जाएगा।

ड्राईवर जैसा कोई रोज़गार धरती पे नहीं बचेगा। जब शहरों और सड़कों से 90% Cars गायब हो जायेंगी, तो Traffic और Parking जैसी समस्याएं स्वतः समाप्त हो जायेंगी... क्योंकि एक कार आज की 20 Cars के बराबर होगी।

आज से 5 या 10 साल पहले ऐसी कोई ऐसी जगह नहीं होती थी जहां PCO न हो। फिर जब सब की जेब में मोबाइल फोन आ गया, तो PCO बंद होने लगे.. फिर उन सब PCO वालों ने फोन का recharge बेचना शुरू कर दिया। अब तो रिचार्ज भी ऑन लाइन होने लगा है।

आपने कभी ध्यान दिया है..?

आजकल बाज़ार में हर तीसरी दुकान आजकल मोबाइल फोन की है।
sale, service, recharge , accessories, repair, maintenance की।

अब सब Paytm से हो जाता है.. अब तो लोग रेल का टिकट भी अपने फोन से ही बुक कराने लगे हैं.. अब पैसे का लेनदेन भी बदल रहा है.. Currency Note की जगह पहले Plastic Money ने ली और अब Digital हो गया है लेनदेन।

दुनिया बहुत तेज़ी से बदल रही है.. आँख कान नाक खुले रखिये वरना आप पीछे छूट जायेंगे..।

समय के साथ बदलने की तैयारी करें।

इसलिए...
व्यक्ति को समयानुसार अपने व्यापार एवं अपने स्वभाव में भी बदलाव करते रहना चाहिये।

"Time to Time Update & Upgrade"

समयके साथ चलिये और सफलता पाईये ।```
*Have a nice time* 🙏🏻

Monday, June 10, 2019

एचआईवी/एड्स के प्रति जागरूकता फैलाती डॉ. नीरज खत्री की नवीन पुस्तक

  • पुस्तक समीक्षा
  • मास मीडिया एंड एच.आई.वी/एड्स अवेयरनेस इन स्लम्स,
  • रैंडम पब्लिकेशन, दरियागंज, नई दिल्ली,
  • मूल्य: 850 रुपये,
  • लेखक : प्रोफ. (डॉ.) नीरज खत्री

भारत देश के लिये एच.आई.वी/एड्स वैसे तो नया नहीं है परन्तु अभी हाल ही में प्रो. नीरज खत्री द्वारा सर्वेक्षण पर आधारित उनकी पुस्तक ने शिक्षा एवं स्वास्थ्य को लेकर आम जगत का ध्यान इस विषय की ओर आकर्षित किया है।इस अध्ययन में स्वास्थ्य के आलावा सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक पक्षों पर भी व्यापकता से प्रकाश डाला गया है। पुस्तक का उद्देश्य झुग्गीवासियों की सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति के आधार पर उनकी मीडिया संबंधी आदतों का अध्ययन करना है। इस नाते यह पुस्तक झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाली जनता के बीच एच.आई.वी/एड्स के प्रति सामान्य जागरुकता का अध्ययन करती है। समाज का वर्तमान स्वरूप काफी बदल चुका है। समाज और जीवन के प्रत्येक भाग पर जनसंचार माध्यमों बहुत अधिक प्रभाव पड़ा है। यह माध्यम न केवल सामाजिक विवेक के प्रति जनता की अवधारणा का निर्माण करते हैं अपितु उनसे प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से जुड़े मुद्दों के प्रति भी जागरुक करते हैं।एच.आई.वी/एड्स भी एक ऐसा ही मुद्दा है। यह पुस्तक झुग्गीवासियों में एच.आई.वी/एड्स के प्रति जागरुक करने में मीडिया के प्रभावों पर आधारित है। इस रोग के उपचार हेतु स्वास्थ्य जगत के पास कोई दवाई नहीं है परन्तु उचित जानकारी से इस रोग की रोकथाम की जा सकती है जिसके लिये एक उचित संचार रणनीति बनानी होगी जो समाज में अपेक्षित बदलाव ला सके। इस हेतु यह पुस्तक न केवल चिकित्सकों अपितु रोगियों में भी स्वास्थ्य एवं मीडिया संबंधी जागरुकता की अनुशंसा करती है।
यह अध्ययन दिल्ली के सबसे अधिक जनसंख्या वाले पांच जिलों उत्तर-पश्चिमी दिल्ली में बादली, दक्षिणी दिल्ली में संजय कॉलोनी और ओखला, पश्चिमी दिल्ली में शकूरबस्ती और नांगलोई, दक्षिण-पश्चिमी दिल्ली में किशनगढ़ और महरौली एवं उत्तर-पूर्वी दिल्ली में सहादरा और अन्नानगर से समान अनुपात में नमूने एकत्र करके किया गया है। इस अध्ययन को करने हेतु पर्पसीव स्ट्रेटिफाईड रैंडम सेम्पलिंग तकनीक द्वारा आंकड़ों का एकत्रण एवं सामाजिक और आर्थिक अध्ययन के लिए कुप्पुस्वामी स्केल का प्रयोग किया गया है।
यह पुस्तक झुग्गीवासियों की जनसंचारमाध्यमों के प्रति आदतों, उनके सामाजिक और आर्थिक स्तर, दिल्ली शहर की झुग्गियों में जनसंचार साधनों द्वारा एच.आई.वी/एड्स के प्रति जागरुक करने के प्रभावों, सरकारी और गैर सरकारी संगठनों द्वारा एच.आई.वी/एड्स की रोकथाम हेतु संचार नेटवर्कों के प्रयोग और एच.आई.वी/एड्स के प्रति जागरुकता बढ़ाने के लिये नई संचार रणनीतियों की खोज करने आदि पक्षों को छूता हुआ एक आधारभूत अध्ययन है। पुस्तक में किये गये सर्वेक्षणों से पता चलता है कि एच.आई.वी/एड्स की रोकथाम के प्रति झुग्गीवासियों को जागरूक करने में रेडियो का अहम योगदान नहीं है 70% उत्तरदाताओं के अनुसार उन्हें एच.आई.वी/एड्स के बारे में सबसे अधिक जानकारी टीवी से मिलती है। यह भी देखने में आया है कि दक्षिणी दिल्ली के जिलों में 81।7% और उत्तर-पश्चिमी दिल्ली के जिलों में 77% आंकड़ों के साथ सबसे ज्यादा जागरुकता टीवी से आई है। इस सर्वेक्षण से यह भी पता चलता है कि जहां इस बारे में फ़िल्में एवं इंटरनेट का प्रभाव सबसे कम है वहीँ पुरुष प्रतिवादियों की अपेक्षा स्त्री प्रतिवादियों पर इसका प्रभाव अधिक देखने को मिला है और 15-24 और 25-34 आयु वर्ग के प्रतिवादियों ने मन है कि एच.आई.वी/एड्स के प्रति जागरुक करने में इंटरनेट अल्पतम प्रभावी है। इस प्रकार उपलब्ध जनसंचार साधनों में से एच.आई.वी/एड्स के प्रति जागरुकता फ़ैलाने में टीवी ही अन्य साधनों की अपेक्षा सबसे अधिक प्रभावी है। इस पुस्तक में लेखक ने एच.आई.वी/एड्स के प्रति जागरुकता फ़ैलाने में सरकारी एवं गैर सरकारी संस्थानों द्वारा अपनाए जा रहे तरीकों के बारे में संबंधित अधिकारीयों का साक्षात्कार लिया है और प्राप्त आंकड़ों का एस.डब्लू.ओ.टी विधि से विश्लेषण किया है। इस अध्ययन से पता चलता है कि दिल्ली की झुग्गियों में रहने वालों में से 31% जनसंख्या बेरोजगार और अकुशल है। इन झुग्गीवासियों में से अधिकतर एच.आई.वी और एड्स के बारे में भ्रम की स्थिति में हैं उनके अनुसार ये दोनों बीमारियां हैं केवल 20% को ही यह पता है कि एच.आई.वी एक वायरस है साथ ही यहां के अधिकतर लोग यह मानते हैं कि एड्स के फैलने का कारण केवल असुरक्षित यौन संबंध हैं।एस.डब्लू.ओ.टी विश्लेषण से यह साफ़ हो जाता है कि इस सबका कारण नीति निर्माताओं कि कमजोरियां हैं जिन्हें उनकी ताकत बनाया जाना चाहिए और यह तभी संभव है जब लघु फ़िल्में और डॉक्यूमेंट्री निर्माता इस विषय पर ध्यान केन्द्रित करें और संबंधित कार्यक्रमों का निर्माण करें।
पुस्तक में लेखक ने झुग्गीवासियों के सामाजिक और आर्थिक जीवन तथा शैक्षिक स्तर में उत्थान की संस्तुति भी की है। इस कार्य हेतु लेखक ने कुछ सुझाव दिये हैं जैसे: मीडिया संबंधी आदतों और व्यक्तिगत स्वच्छता में सुधार हेतु कार्यशालाओं व प्रशिक्षण कार्यक्रमों का आयोजन, एच.आई.वी/एड्स के बारे में जागरुक करने के लिये एक पूर्ण समर्पित अभियान और ब्रांड एम्बेसडर, पत्रों व पत्रिकाओं में आकर्षक विज्ञापन छापना, झुग्गियों के प्राइवेट डॉक्टरों का एच.आई.वी/एड्स और इससे संबंधित शोध कार्यों में निपुण होना जरूरी है।
एच.आई.वी/एड्स से संबंधित पत्रकारिता हेतु पत्रकारों को भी निपुण और पूर्णतः संवेदनशील होना चाहिए, हिंदी पत्र और पत्रिकाएं एच.आई.वी/एड्स से संबंधित समाचारों को अधिक स्थान दें, नाको और दिल्ली स्टेट एड्स कंट्रोल सोसाइटी द्वारा इससे संबंधित अधिक कार्यक्रमों का निर्माण किया जाए आदि।
सर्वेक्षण से यह भी दृष्टिगत होता है कि एच.आई.वी संक्रमित रोगी से मिलने से डॉक्टर और अन्य स्टाफ हिचकता है जबकि इसकी बजाय उन्हें अधिक सावधानी बरतते हुए रोगी की मनोदशा में भी सुधार लाने का प्रयत्न किया जाना चाहिए जिससे रोगी में सुरक्षा और आत्मविश्वास की भावना आए।
देश में एच.आई.वी/एड्स के प्रति जागरुकता फ़ैलाने हेतु कुछ संस्तुतियां इस पुस्तक में की गई हैं जैसेः एच.आई.वी/एड्स के प्रति जनता को जागरुक करने के लिये प्रशिक्षित स्वास्थ्य समन्वयक हों, इस कार्य से जुड़े हुए सरकारी एवं गैर सरकारी संस्थानों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उन द्वारा प्रदत्त फंड्स का उचित एवं सही उपयोग हो और इसके लेशमात्र भी दुरूपयोग की संभावना उत्पन्न न होने पाए, समय-समय पर राजकीय एवं शैक्षिक संस्थानों द्वारा इस विषय पर आधारित अंतर्राष्ट्रीय व राष्ट्र स्तरीय संगोष्ठियों का आयोजन किया जाना चाहिए, मास मीडिया संगठनों और मीडिया शिक्षण संस्थानों द्वारा अपने कर्मियों और छात्रों के लिये इस विषय पर कार्यशालाओं और संगोष्ठियों का नियमित आयोजन किया जाना चाहिए ताकि वो स्वास्थ्य पत्रकारिता में आने वाली चुनौतियों को स्वीकार कर सकें। अंततः यह कहना होगा कि यह शोध आधारित पुस्तक भारत में मास मीडिया की नीतियां निर्धारित करने एवं जन अभियान को उत्प्रेरित करने में एक महत्वपूर्ण साधन के रूप में अपनी भूमिका अदा करेगी। साथ ही यह पुस्तक आने वाले शोधार्थियों, विद्वानों एवं सरकारी स्वास्थ्य कार्यालयों के लिये सन्दर्भ ग्रन्थ का कार्य भी करेगी।

Thursday, March 7, 2019

चिंतित करता है माननीयों का मिजाज

  बुधवार को संतकबीर नगर के कलेक्ट्रेट में जो हुआ, उससे केवल संतकबीर नगर ही बल्कि हर भारतीय को शर्मशार कर गया। अभी तक केवल संसद और विधानसभा में ही इस तरह के दृश्य देखने को मिलते थे, लेकिन जिला योजना की बैठक में जिस तरह से अपने ही पार्टी के विधायक और सांसद ने जूतम पैजार किया, वह भारतीय लोकतंत्र के लिए सही नहीं कहा जा सकता है।
संत कबीर नगर में जो घटा है वो कबीर की हर वाणी के खिलाफ घटा है। संत कबीर नगर की इस घटना में न तो कबीर जैसा कुछ था, न ही संत जैसा। कुछ था तो सिर्फ जूता था। वीडियो के पहले कुछ शॉट में बातचीत हो रही है। सांसद शरद त्रिपाठी पूछ रहे हैं कि एक योजना के शिलापट में उनका नाम क्यों नहीं था। इसी बात को लेकर बीजेपी सांसद शरद त्रिपाठी और बीजेपी विधायक राकेश सिंह बघेल के बीच कहा-सुनी होती है और सासंद त्रिपाठी विधायक को अपशब्दों की बौछार कर देते हैं तो विधायक बघेल ने प्रतिक्रिया में कह दिया कि जूते मारेंगे। बस सासंद त्रिपाठी जूता निकालकर विधायक राकेश सिंह बघेल पर बरसाने लगते हैं। बचाव में विधायक बघेल ने भी हाथों से मारने का प्रयास किया मगर सासंद त्रिपाठी की तरह वे बदला नहीं ले पाए।
 जिला कार्य योजना समिति की बैठक में तमाम अफसरों के बीच नाम नहीं होने को लेकर जूते का निकल आना, उस अहंकार का निकल आना है जो पैदा होता है जातिवाद के अहंकार से।
भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रवाद की पाठशाला में जहां जातिवाद के खिलाफ लैक्चर दिए जाते हैं, उस पाठशाला में सासंद त्रिपाठी को एक साल के लिए भेज दिया जाना चाहिए। अगर राष्ट्रवाद का असर इन्हीं पर नहीं होगा तो किस पर होगा। सीमा पर तनाव है और सांसद विधायक को जूता मार रहे हैं। इस दृश्य से सेना का मनोबल गिर सकता है। फिलहाल जि़ला प्रशासन इस घटना से सबक ले सकता है।
 भारतीय राजनीति के इस विकास की भी समीक्षा कीजिए, जो समाज के संकीर्ण संस्कारों से बना होता है। अब आते हैं उस खबर पर जिस पर यकीन नहीं हो रहा है. रक्षा मंत्रालय से राफेल मामले की सीक्रेट फाइल चोरी हो गई है। रक्षा मंत्रालय की सीक्रेट फाइल चोरी हो गई है. वो भी रक्षा मंत्रालय से चोरी हुई है। ये किसी ने नहीं सोचा होगा कि तरह तरह के मोड़ से गुजऱता हुआ राफेल इस मोड़ पर पहुंच जाएगा। सरकार जिस फाइल को सीक्रेट बता कर दुनिया को नहीं बता रही थी, उसी सीक्रेट फाइल की रक्षा नहीं कर सकी और वो चोरी हो गई। सरकार ने यह बात सुप्रीम कोर्ट में कही है। विपक्ष चाहे तो सीक्रेट फाइल से ही इस्तीफा मांग सकता है, क्योंकि सरकार से इस्तीफा मांगने पर सेना का मनोबल गिर सकता है।
यह दोनों बातें लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए पुनर्चिंतन के लिए हम सबको सोचने के लिए मजबूर करती हैं। कहां जा रहा है हमारा लोकतंत्र। देश और प्रदेश की सरकार चलाने वाले विधायक और सांसद का यह कृत्य कहीं से देश और प्रदेश को विकास की राह पर ले जाने वाले नहीं हैं। रक्षा मंत्रालय जैसी सुरक्षित जगह से फाइलों का गायब हो जाना भी कहीं से सही नहीं लगता है। इतनी सुरक्षित जगह से फाइलों की जगह ऐेसे दस्तावेज भी गायब हो सकते हैं जो देश के लिए खतरनाक हो सकते हैं। 

Tuesday, February 26, 2019

आत्मविश्वास सबसे बड़ी शक्ति तथा आत्महीनता सबसे बड़ी कमजोरी है!


प्रदीप कुमार सिंह
(1)           संसार में धन, वैभव, पद तथा शक्ति ही सब कुछ नहीं है। यदि इनकी दिशा लोक कल्याण की तरफ नहीं हुई तो ये कांटों की तरह हैं। जो संसार में रहते हुए परहित की शरण में जाता है उसकी झोली परहित रूपी फूलों से भर जाती है और जो दूसरों को पीड़ा पहुँचाने की राह पर चलकर समाज से दूरियाँ बनाता है उसकी झोली कांटों से भर जाती है अर्थात उसका सामाजिक रूप से विनाश हो जाता है। मनुष्य परिस्थितियों का दास नहीं, वह उनका निर्माता, नियंत्रणकर्ता और स्वामी है। आत्मविश्वास वह मजबूत आधार है जिस पर खड़े होकर कोई भी व्यक्ति अपनी सपनों को साकार रूप दे सकता है, लेकिन दुनिया में अधिकांश लोग ऐसे हैं, जिनमें इस आत्मविश्वास की कमी होती है, जिसके कारण किसी भी दिशा में वे अपने कदम आगे बढ़ाने से घबराते हैं, आशंकाओं से घिरे रहते हैं और स्वयं को कमजोर महसूस करते हैं। ऐसे लोगों को सदैव दुनियावालों की फिक्र होती है, उन्हें लगता है कि यदि वे असफल हो गए तो समाज में उनकी छवि खराब होगी। इसलिए ऐसे लोग किसी भी नए कार्य की शुरूआत नहीं कर पाते, पहल नहीं कर पाते और न ही किसी समूह का कुशल नेतृत्व कर पाते हैं। ये लोग नई सोच तो रखते हैं, लेकिन उसे कार्य रूप में परिणित नहीं कर पाते जिनमें प्रबल आत्मविश्वास तथा भरपूर उत्साह होता है वह ही नये विचार को कार्य में परिणित कर पाते है। चर्चित मनोवैज्ञानिक लुईस एल हे ने अपनी पुस्तक सेल्फ एस्टीम एफर्मेशन्समें आत्मविश्वास को सफलता का मूलमंत्र मानते हुए कहा है- यदि व्यक्ति को कामयाबी हासिल करनी है तो आत्मविश्वास के इस कवच को धारण करना ही होगा।
(2)           ऐसे ही एक सच्ची कहानी गहलौर, गया (बिहार) के दशरथ माँझी की है, जिन्हें आज दुनिया माउंटेनमैनके नाम से भी जानती है। यह सच्ची कहानी एक ऐसे इनसान की है, जिसे लोग सनकी मानते थे। उसके बारे में तरह-तरह की बातें कहते थे, उसका मजाक उड़ाते थे, लेकिन उसने लोगों की परवाह नहीं की और अपने अकेले दम पर 22 साल तक पहाड़ को काटने का कार्य किया और 27 फीट ऊँचे पहाड़ के बीच से 30 फीट चौड़ा रास्ता बना दिया। दशरथ माँझी के इस लोक कल्याणकारी अथक प्रयास से 80 किलोमीटर की वह दूरी, जिसे पार करना लोगों की मजबूरी बन गई थी, तीन किलोमीटर में सिमट गई। दशरथ माँझी का मजाक बनाने वाले गाँव के किसी भी व्यक्ति में इतनी हिम्मत नहीं थी कि लोक कल्याण से भरे इस असंम्भव कार्य को संम्भव करने के बारे में सोच भी सके।
(3)           लोक कल्याण के आत्मविश्वास के बल पर दशरथ माँझी को जो प्रेरणा मिलती गई, उसी के सहारे उन्होंने वह कार्य कर दिखाया, जिसकी सराहना आज पूरी दुनिया करती है। उसके कार्य की सफलता का उपयोग गाँववासी करते हैं और मन से दशरथ माँझी का बारम्बर हार्दिक आभार प्रकट करते हैं। ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जो यह सिद्ध करते हैं कि व्यक्ति के अंदर आत्मविश्वास होने तथा मार्ग कठिन होने पर भी आगे बढ़ने के रास्ते स्वयमेव बनते चले गए और उस व्यक्ति के आगे परिस्थितियों को हार माननी पड़ी।
(4)           खुद पर अटूट विश्वास के कारण ही जोन ऑफ आर्कजैसी फ्रांसीसी सेना का नेतृत्व एक ग्रामीण लड़की ने किया। इतना ही नहीं, उसके इस प्रबल आत्मविश्वास के कारण ही फ्रांस के राजा को भी उसके आदेशों का पालन करना पड़ा। विलियम पिट को जब इंग्लैंड के प्रधानमंत्री पद से हटाया गया, तब उन्होंने डेवनशायर के डयूक से बड़े आत्मविश्वास के साथ कहा कि- इस देश को मैं ही बचा सकता हूँ, इस कार्य को मेरे सिवा कोई दूसरा नहीं कर सकता।इंग्लैंड में 11 हफ्ते तक बिना प्रधानमंत्री के ही काम चलता रहा और अंत में पिट को ही योग्य मानते हुए शासनाधिकार सौंप दिया गया।
(5)           ऐसा ही एक उदाहरण बेंजामिन डिजारायली का है, जिनको यहूदीकहकर उनका निरादर किया जाता था। ब्रिटिश पार्लियामेंट के सदस्यों ने उनके तिरस्कार में कभी कोई कसर नहीं छोड़ी, पर वह उनके मध्य आत्मविश्वास के साथ बैठे रहे और इसी के बल पर वे इंग्लैंड के प्रधानमंत्री बने। बेंजामिन ने अपना तिरस्कार करने वालों को भी वाह-वाह करने पर मजबूर कर दिया। इसी तरह नेपोलियन, लूथर वैस्ले, बिस्मार्क और सेवोनारोला जैसे सामान्य लोग अपने प्रबल आत्मविश्वास के कारण महान लोगों की श्रेणी में आ गए और अपने जीवन में आश्चर्यजनक सफलताएँ प्राप्त कर सके।
(6)           जीवन में बाधाओं का हर व्यक्ति सामना करता है। बाधाएँ हमारी राह में आने वाली वो रूकावटें हैं, जो हमें आगे नहीं बढ़ने देतीं। बाधाओं का रोना रोने वालों की कमी नहीं है, पर वे भूल जाते हैं कि यदि जीवन है तो बाधाएँ आएँगी ही, ये तो प्रकृति का नियम है। विख्यात मनोवैज्ञानिक रेमंड कैटल का कहना है कि बाधाओं से डरें नहीं, बल्कि उन पर हँसना सीखें। ऐसे में बाधाओं में व्यक्ति को दरारें पड़ती दीखेंगी। उनके अनुसार, बाधाएँ कुछ नहीं हैं, वे तो केवल मृग-मरीचिका हैं, जिन्हें हम सच मान लेते हैं और उनके साथ ऐसा व्यवहार करते हैं, मानो वे सच का मूर्तिमान रूप हों। सही मायने में बाधाएँ या तो हमारे पैरों तले कुचली जाएँगी या वे हमें पीछे हटने पर मजबूर कर देंगी और यह इस बात पर निर्भर करता है कि हम बाधाओं को किस रूप में स्वीकार करते हैं। उनसे डरने वाले पीछे हटने को मजबूर होते हैं; जबकि उनसे लड़ने वाले बाधाओं को ही डरा कर दूर कर देते हैं।
(7)           अमेरिका के तीसरे राष्ट्रपति थॉमस जेफरसन बाधाओं से निपटने के बारे में कहते थे-हमेशा चीजों को चिकने हैंडल की तरफ से पकड़ो।उनके इस कथन का अर्थ था कि शुरूआत हमेशा ऐसी जगह से करनी चाहिए, जहाँ से कार्य करने में आसानी हो और प्रतिरोध की गुंजाइश कम हो और हमारी सोच सदा सकारात्मक हो। विज्ञानी एरिक बर्लो का कहना है-‘‘कोई भी कार्य जटिल क्यों समझा जाता है, इसका जवाब एक ही है कि व्यक्ति के अंदर बाधाओं को पार करने की गहन, प्रबल और सच्ची इच्छा नहीं होती।’’ आज के प्रेरक वक्ताओं में से एक जोसेफ मर्फी का कहना है कि यदि व्यक्ति के अंदर जटिल समझे जाने वाले काम को सरलता से करने की प्रबल इच्छा है तो इसका मतलब है कि मार्ग की आधी दूरी तय की जा चुकी है और बाकी दूरी कार्य करते ही पूर्ण हो जाएगी।
(8)           प्रसिद्ध मानव व्यवहार विशेषज्ञ ग्रेस फ्लेमिंग, आत्मविश्वास को सफलता की कुंजी मानते हैं। उन्होंने कहा है कि यदि मनुष्य अपना आत्मविश्वास बढ़ाना चाहते हैं तो सबसे पहले वे अपनी कमजोरियों को पहचानें तथा उन्हें दूर करने की खुद में शक्ति पैदा करें। ये कमजोरियाँ हमारे व्यक्तित्व में किसी भी प्रकार की हो सकती हैं, जैसे-हमारा खराब स्वास्थ्य, रूप-रंग, पारिवारिक पृष्ठभूमि, रहन-सहन, वजन, गुण, बुरी आदतें, गरीबी आदि। हमें अपनी कमजोरियों की तह में जाकर इनके कारगर समाधान ढूँढ़ने चाहिए। अपनी इन कमजोरियों का मुकाबला करने में सबसे पहले हमें डर लगेगा, लेकिन इस डर को दूर करके ही हम अपनी कमजोरियों को दूर कर सकेंगे और अपने आत्मविश्वास को बढ़ा सकेंगे।इसलिए कहा जाता है कि आत्मविश्वास सबसे बड़ी शक्ति तथा आत्महीनता सबसे बड़ी कमजोरी है। अपने दीपक स्वयं बनना चाहिए। सत्य की स्वयं की अनुभूति की सुगन्ध स्थायी होती है सत्य की खोजी ज्ञान की खोज कहीं बाहर नहीं बल्कि स्वयं में करता है और जीवन के सत्य को पा लेता है।
(9)           आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है हृदयों की एकता की हैं। एकता के वृक्ष पर ही शान्ति के फल लगते हैं। हृदय की एकता के लिए पवित्रता आवश्यक है। केवल पवित्र हृदय ही मिलकर एक हो सकते हैं। चाहे वह परिवार हो या समाज। हृदय पवित्र नहीं है तो एकता स्थापित नहीं हो सकती। पवित्र हृदय वह है जो पूर्णतया स्वार्थ से रहित हो। उस हृदय में लेशमात्र भी स्वार्थ न हो। पूर्णतया पवित्र हृदय ही परिवार तथा समाज में एकता स्थापित कर सकता है। इस प्रकार वह परिवार तथा समाज को सुखी बनाने में अपना योगदान दे सकता है। यदि किसी मनुष्य में 1000 गुण हां किन्तु एक स्वार्थ का अवगुण भी आ जाये तो उस व्यक्ति के सभी 1000 गुण समाप्त हो जायेंगे और केवल स्वार्थ का अवगुण ही रह जायेगा।
(10)         स्वार्थ एक लाइलाज बीमारी है जो मनुष्य के सभी गुणों को पूर्णतया नष्ट कर देती है और मनुष्य में एक भी गुण शेष नहीं रह जाता। ऐसा व्यक्ति अच्छा कार्य भी करता है तो उसमें भी केवल स्वार्थ की छिपी भावना रहती है। लोक हित तथा समाज सेवा की भावना नहीं रह जाती। व्यक्तिगत जीवन, परिवार तथा समाज में अशान्ति का कारण स्वार्थ होता है। स्वार्थी व्यक्ति स्वयं तो नष्ट तथा भ्रष्ट हो जाता है साथ ही अपने परिवार तथा समाज को भी नष्ट तथा भ्रष्ट करने में पूरा योगदान देता है।

Friday, February 22, 2019

आखिर यह मनोदशा क्या है?

प्रदीप कुमार सिंह
व्यक्ति की मनःस्थिति में प्रायः उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। कभी मन अच्छा रहता है तो वह हर परिस्थिति का आनंद ले पाता है, अपनी खुशियों को सबको बाँटता फिरता है और यदि मन खराब हो जाए तो किसी से बात करना भी पसंद नहीं करता। बिगड़ी हुई मनःस्थिति के कारण किसी भी काम को करने में मन नहीं लगता। मनःस्थिति का बिगड़ना मन की एक अजीब-सी दशा होती है, जिसके कारण मन अनमना-सा हो जाता है। ऐसी दशा में व्यक्ति यह चाहता है कि उसका मन ठीक हो जाए।  मनोविज्ञानी जैजोक का कहना है कि यह एक ऐसी मानसिक अवस्था है, जिसके अच्छे या बुरे होने पर हमारे व्यवहार, क्रिया व परिणाम में अंतर दिखलाई पड़ने लगता है। सामान्य बोल-चाल की भाषा में यही ‘मूड’ कहलाता है। यों तो यह एक अस्थायी मनोदशा है, लेकिन जब तक मन की यह दशा व्यक्ति के साथ रहती है, उसे निष्क्रिय बनाए रहती है। मनोदशा का हमारी जिंदगी पर बहुत असर होता है। ‘अगर हम अच्छी मनोदशा में होते हैं, तो अपना विरोध करने वाली बातों व आलोचनाओं को भी आसानी से सुन लेते हैं। लेकिन अगर हम खराब मनोदशा में होते हैं, तो अपने खिलाफ कुछ भी सुनना नहीं चाहते।’-ऐसा मानना है टैक्सास विश्वविद्यालय में मनोविज्ञान के प्रोफेसर डॉ0 आर्ट मार्कमैन का। हमारी जिंदगी को संतुलित बनाने के लिए अच्छी मनोदशा की बेहद जरूरत होती है। लेकिन आज जीवन की जटिलताएँ इतनी बढ़ गई हैं कि सामान्य व्यक्ति अक्सर ही खराब मनःस्थिति में पहुँच जाता है। जीवन में जैसे-जैसे कठिनाइयाँ बढ़ती जाती हैं, मानसिक दबाव बढ़ता जाता है। हमारे जीवन का उद्देश्य भी यही होता है कि किस तरह  अधिक से अधिक धन का संग्रह किया जा सके, पदोन्नति व वाहवाही मिल सके। जीवन इसके अतिरिक्त भी कुछ है, यह सामान्य व्यक्ति को नहीं मालूम, और न ही वह इसे मालूम करना चाहता है। बस, यही अज्ञानता व अनभिज्ञता हमारी इस विपिन्न मनःस्थिति का कारण बन जाती है।
प्रसिद्ध लेखक क्रिस्टीना कर्टिस का कहना है कि काम की जगह पर अपनी मनोदशा को संतुलित रखना बहुत जरूरी होता है; क्योंकि मनोदशा का हमारी कामयाबी से बहुत बड़ा रिश्ता होता है। क्रिस्टीना एक बहुत प्रसिद्ध लीडरशिप कोच हैं और उन्होंने अमेरिकी एथलीटों के साथ भी काम किया है। यदि बिगड़ी हुई मनोदशा का मात्र स्वयं से ही लेना-देना हो, तो इससे ज्यादा नुकसान नहीं होता। लेकिन यदि इसका असर दूसरों पर भी पड़ने लगे, तो सचमुच यह खतरे की घंटी है। व्यक्ति की जब मनोदशा खराब होती है, तो वह अंदर-ही-अंदर घुटने लगता है। उसे यह समझ नहीं आता कि इस मनोदशा को कैसे ठीक किया जाए? इस मनोदशा से बाहर कैसे निकला जाए? इस मनोदशा में एकाग्रता बिलकुल नहीं रहती, मन अशांत व बेचैन हो जाता है, कहीं भी कुछ करने में मन नहीं लगता और इस मनोदशा में समय और ऊर्जा, दोनों का व्यय होता है।  हमें अपनी जीवनशैली को सुधारने की ओर भी ध्यान देना चाहिए। हमारा रहन-सहन जितना निर्द्वंद्व व निश्छल होगा, उतनी ही अनुकूल हमारी आंतरिक मनःस्थिति होगी। जहाँ जीवन में बनावटीपन, दिखावा, झूठी शान, प्रतिस्पर्धा होंगे, वहाँ लोगों की मनोदशा (मूड) उतनी ही असामान्य होती चली जाती है। इसलिए विद्वान लोग यह कहते हैं कि जब कभी मनोदशा खराब हो जाए, तो उसे स्वतः अपनी स्वाभाविक मानसिक प्रक्रिया द्वारा ठीक होने के लिए नहीं छोड़ना चाहिए, बल्कि उसको सामान्य स्थिति में लाने का प्रयत्न आरंभ कर देना चाहिए। इससे कम समय में मनःस्थिति को ठीक किया जा सकता है। यदि मनोदशा खराब हो जाए तो अपने मन को किसी न किसी आश्रय से अवश्य बाँध देना चाहिए, जैसे-मानवीय गुणों से भरी पुस्तकों का स्वाध्याय, मनोरंजन, प्रकृति का सान्निध्य, हँसी-मजाक वगैरह आदि। इससे ‘मन’ जल्दी बदलता है और मनोदशा को सामान्य करना आसान हो जाता है।

Tuesday, February 12, 2019

प्रियंका गांधी और 'कांग्रेस युक्त भारत'

निर्मल रानी
स्वतंत्रता संग्राम में सबसे अग्रणी रहने वाले राजनैतिक संगठन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का नामो-निशान मिटाने के कितने प्रयास गत् पांच वर्षों में किए गए यह देश के लोगों से छुपा नहीं है। स्वयं देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व उनके परम सहयोगी भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह अनेक बार सार्वजनिक सभाओं में 'कांग्रेस मुक्त भारत' का नारा देते रहे हैं। पिछले दिनों राजस्थान के एक चुनाव में तो प्रधानमंत्री ने सीधे तौर पर जनता से यही अपील कर डाली थी कि-'राजस्थान में कांग्रेस पार्टी एक भी सीट जीतने न पाए'। उनकी इस अपील का नतीजा क्या हुआ इस पर रौशनी डालने की तो कोई ज़रूरत ही नहीं परंतु प्रधानमंत्री की इस अपील के अर्थ को समझना बेहद ज़रूरी है। प्रधानमंत्री की यह अपील अपने-आप में यह बताती है कि उनका लक्ष्य विपक्षहीन राजनीति करना है। इस तज़र्-ए-सियासत को तानाशाही की आकांक्षा का उत्कर्ष भी कहा जा सकता है।
 बहरहाल, पांच वर्ष के अहंकारपूर्ण व देश के लोकतांत्रिक मूल्यों व संस्थाओं को चुनौती देने वाले शासन का चिरा$ग अब टिमटिमाता दिखाई दे रहा है। उत्तर भारत के तीन प्रमुख राज्य जो सत्ताधारियों की मंशा के अनुसार 'कांग्रेस मुक्त' हो चुके थे एक बार फिर 'कांग्रेस युक्त' हो गए हैं। देश को विपक्षहीन करने की खतरनाक साजि़श को पलीता लग चुका है। पप्पू के नाम से बदनाम किए जाने वाले राहुल गांधी ने अपना दमखम कुछ इस अंदाज़ में दिखाना शुरु कर दिया है जैसाकि अब तक के किसी भी कांग्रेस अध्यक्ष ने प्रदर्शित नहीं किया। प्रधानमंत्री को सीधे तौर पर खुले शब्दों में चुनौती देने व उन्हें उलझा कर रखने की हि मत राहुल गांधी ने दिखा दी है। स्वयं उनके अपने गृह राज्य गुजरात में पुन: सत्ता पाने के लिए इन्हें अपनी न सिर्फ पूरी ताकत झोंकनी पड़ी बल्कि हर प्रकार के हथकंडे भी अपनाने पड़े। इसके बावजूद भाजपा अपने विधायकों की सं या 100 तक भी नहीं पहुंचा सकी। गुजरात के चुनाव परिणामों से ही पता चल गया था कि मोदी-शाह की विभाजनकारी राजनीति का चिराग अब बुझने वाला है। और आखिरकार राजस्थान, छत्तीसगढ़ व मध्यप्रदेश में वैसा ही हुआ।
 अभी भारतवर्ष पुन: 'कांग्रेसयुक्त' होने की राह में अपने कदम आगे बढ़ा ही रहा था कि अचानक पिछले दिनों राजीव गांधी की पुत्री प्रियंका गांधी का राजनीति में अधिकृत रूप से पदार्पण हो गया। हालांकि प्रियंका गांधी बचपन से ही अपने माता-पिता व दादी स्वर्गीय इंदिरा गांधी के साथ अक्सर इलाहाबाद, लखनऊ, रायबरेली व अमेठी आदि स्थानों पर आती-जाती रही हैं। कहा जा सकता है कि उनका चेहरा व उनकी आवाज़ व सानिध्य देश के लोगों खासतौर पर उत्तर प्रदेश के लोगों के लिए कोई नई बात नहीं है। प्रियंका गांधी तो अपनी मां सोनिया गांधी व भाई राहुल गांधी के संसदीय क्षेत्राों में इनके समर्थन में जनसभाएं भी करती रही हैं। मगर उनके पूर्व के दौरे व सभाएं एक गैर राजनैतिक प्रियंका के रूप में हुआ करते थे। वे केवल एक बेटी या बहन के रूप में अमेठी व रायबरेली जाया करती थीं। परंतु गत् दिनों राहुल गांधी ने प्रियंका को बाकायदा अपनी टीम में शामिल कर  व अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी का महासचिव बनाकर पूर्वी उत्तर प्रदेश की जि़ मेदारी भी उन्हें सौंप दी। गत् 11 फरवरी को प्रियंका गांधी ने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी व अपने एक और सहयोगी कांग्रेस महासचिव ज्योर्तिआदित्य सिंधिया के साथ उत्तर प्रदेश के कांग्रेस कार्यालय में पहुंच कर अपना काम-काज संभाल लिया। मीडिया के माध्यम से देश ने भी देखा कि किस प्रकार लाखों लोगों का हुजूम लखनऊ के अमौसी हवाई अड्डे से लेकर कांग्रेस कार्यालय के लगभग 14 किलोमीटर लंबे मार्ग में प्रियंका गांधी के स्वागत हेतु पलकें बिछाए खड़ा था।
    प्रियंका के राजनीति में आते ही कांग्रेस विरोध की राजनीति करने वाले नेताओं के चेहरे पीले पड़ने शुरु हो गए हैं। उनके चेहरों पर हवाईयां उड़ने लगी हैं। अपना आपा खोकर चंद कुत्सित मानसिकता रखने वाले लोग प्रियंका की सुंदरता व उनके आकर्षण को लेकर अपने 'संस्कार' के अनुरूप उनपर गंदी व भद्दी टिप्पणीयां कर रहे हैं। स्वयं परिवारवाद के चंगुल में फंसे हुए कांग्रेस विरोधी नेताओं को प्रियंका गांधी के राजनीति में पदापर्ण में भी परिवारवाद ही दिखाई दे रहा है। जो भाजपाई समाजवादी पार्टी व बहुजन समाज पार्टी द्वारा कांग्रेस को दरकिनार कर किए गए गठबंधन को लेकर कांग्रेस को आईना दिखाते फिर रहे थे वही लोग प्रियंका गांधी के उत्तर प्रदेश में सीधे राजनैतिक दखल देने की खबरों से बौखला उठे हैं। विपक्षी या कांग्रेस को अपनी सत्ता के लिए सबसे बड़ा खतरा मानने वाले राजनैतिक दल भले ही प्रियंका गांधी को कितने ही अपशब्द क्यों न कहें या उनपर कैसी ही टिप्पणीयां क्यां न करें परंतु गांधी-नेहरू परिवार की धर्मनिरपेक्ष नीतियों पर आस्था रखने वाला देश का एक बड़ा वर्ग प्रियंका गांधी में उस इंदिरा गांधी की छवि देख रहा है जिस इंदिरा गांधी को भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी ने लोकसभा में 'दुर्गा' की संज्ञा दी थी।
वैसे भी राजनीति के वर्तमान दौर में जिस प्रकार की गंदी, ओछी, सांप्रदायिकता से परिपूर्ण, नफरत के बीज बोने वाली भाषाओं का इस्तेमाल किया जाता है और राजनीति के चेहरे को कलंकित व कुरूपित किया जा रहा है ऐसे दौर में प्रियंका गांधी का राजनीति में पदार्पण करना भी भारतीय राजनीति के लिए एक सुखद आभास कहा जा सकता है। वैसे भी प्रियंका गांधी के राजनीति में आने से पूर्व रायबरेली में दिए गए उनके भाषणों के अंशों को यदि आप देखें तो प्रियंका का भाषण निश्चित रूप से द्वेष या वैमनस्य पर आधारित होने के बजाए इंसानियत, भाईचारा व सद्भाव को प्रोत्साहन देने वाला भाषणा होता है। उनके भाषण में देश के संवैधानिक व लोकतांत्रिक मूल्यों को बचाने व उसकी रक्षा करने की आकांक्षा नज़र आती है। वे राजनीति को शासक या शासन की नज़रों से देखने के बजाए सेवा तथा कर्तव्य के नज़रिए से देखती हैं। उनकी आवाज़ व उनका अंदाज़ स्वयं अपने-आप में इस बात की दलील पेश करता है कि वे पंडित मोतीलाल नेहरू, जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी-फिरोज़ गांधी तथा राजीव गांधी की मज़बूत व स्वतंत्रता संग्राम से लेकर देश को प्रगतिशील बनाने वाली विरासत का ही प्रतिनितिधत्व कर रही हैं।
 राहुल गांधी ने उत्तर प्रदेश जैसे देश के सबसे बड़े राज्य के माध्यम से प्रियंका गांधी को राजनैतिक मैदान में उतारने का जो निर्णय लिया है वह निश्चित रूप से अत्यंत समझ-बूझ कर व ठीक समय पर लिया गया निर्णय है। जुमलेबाज़ी, झूठे वादों व आश्वासनों की राजनीति के इस दौर में आज देश को एक बार फिर ऐसे नेताओं व नेतृत्व की ज़रूरत है जो देश की सीमाओं की मज़बूती से रक्षा कर सकें, देश के किसानों को आत्महत्या करने से बचा सकें तथा उन्हें उनकी फसल का मुनाफा सहित मूल्य दिला सकें। देश के युवाओं में रोज़गार की उ मीदें पैदा कर सकें। मंहगाई पर लगाम लगा सकें। शिक्षा व स्वास्थय व्यवस्था देश के सभी लोगों के लिए एक समान हो सके। देश को धर्मों व जातियों के नाम से बांटने वालों पर नियंत्रण किया जा सके तथा देश के उत्पादन वृद्धि की दर बढ़ सके। ऐसे में प्रियंका गांधी का राजनीति में पदार्पण जहां 'कांग्रेस मुक्त भारत' का सपना देखने वालों की नींद उड़ाता है वहीं प्रियंका की राष्ट्रव्यापी लोकप्रियता देश के लोगों में एक बार फिर 'कांग्रेस युक्त भारत' की आस पैदा करती है।

Saturday, February 9, 2019

जीवन के विकास के लिए काम और आराम दोनों ही जरूरी हैं!


प्रदीप कुमार सिंह
काम और आराम में संतुलन बनाने से जीवन सफल बनता है :-

कुछ लोग काम को अधिक महत्त्व देते हैं और आराम करना पसंद नहीं करते और कुछ लोग आराम को इतना महत्त्व देते हैं कि कुछ काम ही नहीं करना चाहते; जबकि काम और आराम में संतुलन बिठाने से ही जीवन स्वस्थ व संतुलित गति से प्रवाहित होता है। मनोवैज्ञानिक डॉ0 विलियम एस. एडलर का कहना है कि यदि कोई व्यक्ति अपने जीवन में ठीक से विश्रांत नहीं हो पाता है तो इसका एकमात्र कारण है कि वह तनाव में है और तनाव चिंता का बाई प्रोडक्ट है।उनका यह भी कहना है कि काम की अधिकता से संकट नहीं है, संकट है, उसका बोझ महसूस करना।
मेरे पास इतना समय कहाँ है कि मैं चिंता करूँ :-
ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल रोजाना नियमित रूप से 18 घंटे काम करते थे। उनसे किसी ने एक बार पूछा- ‘‘आपके पास इतनी समस्याएँ हैं, आपको चिंता नहीं होती?’’ चर्चिल का जवाब था- ‘‘मेरे पास इतना समय कहाँ है कि मैं चिंता करूँ।’’ ठीक इसी तरह की बात महान वैज्ञानिक ब्लेसी पास्कल भी कहते थे- ‘‘पुस्तकालयों और प्रयोगशालाओं में शांति इसलिए रहती है; क्योंकि वहाँ सब अपने काम में इतना मग्न रहते हैं कि उन्हें अपने बारे में चिंता करने का समय ही नहीं मिलता।’’ यह बात शाब्दिक तौर से ही नहीं, बल्कि व्यावहारिक रूप से भी सच है कि चिंता नहीं होगी यदि चिंता करने का समय ही नहीं मिलेगा।
तनावों और दबावों से जूझने के लिए सोना और खेलना बहुत जरूरी है :-
आराम का मतलब है- मस्तिष्क को तरह-तरह के विचारों, विभिन्न प्रकार के कार्यों से थोड़ी देर के लिए खाली कर देना। उसे इतना रिक्त कर देना कि उसमें से सब कुछ बाहर आ जाए यहाँ तक कि द्वेष, निराशा, कुंठा, क्रोध आदि विकार भी मस्तिष्क में न रहने पाएँ। इवोल्युशनरी साइकियेट्रीपुस्तक को लिखने वाली हॉर्वर्ड मेडिकल स्कूल के साइकियेट्री विभाग की सदस्या डॉ0 एमिली डीन्स का कहना है कि अपने तनावों और दबावों से जूझने के लिए सोना और खेलना बहुत जरूरी है। एक भरपूर नींद और थोड़ी-सी खेलने की प्रवृत्ति हमारी जिंदगी को बेहतर बना सकती है।जीवन जीने के लिए एक तरह के संतुलन की जरूरत पड़ती है और यह संतुलन कार्य और आराम के बीच तालमेल बैठाने से आता है।
मनुष्य का जन्म सहज होता है लेकिन मनुष्यता कठिन परिश्रम से प्राप्त की जाती है :-
हमारे मन की प्रवृत्तियाँ ही शरीर के अंग-प्रत्यंगों एवं सूक्ष्मचेष्टाओं पर सबसे अधिक असर डालती हैं। कोई भी काम कितना मुश्किल है यह इस बात पर निर्भर करता है कि हम उसके बारे में क्या सोचते हैं? महान दार्शनिक जर्मी बेंथम इस बारे में कहते थे कि मैं कभी िंचंता नहीं करता; क्योंकि मैं जिन बातों की चिंता करूँगा, वे शायद ही कभी पूरी होंगी। पर जिन कामों में मैं व्यस्त हूँ, वे आज नहीं तो कल अवश्य पूरे होंगे।इसलिए यह जरूरी है कि कार्य की मुश्किलों को दूर करने के लिए कार्य किया जाए न कि चिंता। मनुष्य कार्य की अधिकता से नहीं वरन् कार्य को बोझ समझकर तथा अनियमित ढंग से करने से थकता है। मनुष्य का जन्म तो सहज होता है लेकिन मनुष्यता उसे कठिन परिश्रम से प्राप्त करनी पड़ती है।
काम के साथ थोड़ा सा खेल अत्यधिक लाभदायक है :-
यदि हम ठीक प्रकार से नींद ले पाते हैं तो काम करने के लिए भली प्रकार तैयार हो पाते हैं और फिर स्वस्थ, प्रसन्न, शांत व तरोताजा मन से कार्य कर पाते हैं। इसी तरह मन को उत्साहित करने का कार्य छोटे-छोटे खेल करते हैं। काम की भागमभाग में थोड़ा-सा खेल हमारे तन व मन पर गजब का असर डालता है।

Thursday, February 7, 2019

दूसरों के 'कंधे' इस्तेमाल करने का यह सियासी चलन...

निर्मल रानी
पूरा देश इस समय बड़ी ही बेसब्री से 2019 के चुनाव का इंतज़ार कर रहा है।  सत्तापक्ष हो या विपक्षी गठबंधन हो या महागठबंधन, राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन हो या संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन, कांग्रेस हो या भारतीय जनता पार्टी या देश के अनेक क्षेत्रीय राजनैतिक दल हर जगह राजनैतिक नफे-नुकसान के मद्देनज़र बयानबाजि़यां की जा रही हैं तथा जोड़-तोड़ व गठजोड़ के प्रयास किए जा रहे हैं। भारतीय राजनीति में एक बात तो लगभग तय हो चुकी है कि प्राय: नेताओं की न तो कोई विचारधारा होती है न ही उनका कोई स्थायी राजनैतिक दुश्मन या दोस्त। राजनीति की इस काली कोठरी में सत्ता व कुर्सी की लालच में गुरू-शिष्य के मध्य के रिश्ते व शिष्टाचार तथा आदर व त्याग की भावनाओं की भी तिलांजलि दी जा सकती है। और इसी राजनैतिक चतुराई या चालबाज़ी का ही एक रूप है दूसरों के कंधों का सहारा लेना। भारतीय राजनीति में यह परंपरा भी कोई नई परंपरा नहीं। वैसे भी हमारे देश में यह कहावत बहुत प्रचलित है कि 'दुश्मन का दुश्मन अपना दोस्त हो सकता है'।
बहरहाल, कंधों की सियासत पर आपत्ति जताने वाला पहला बयान पिछले दिनों केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी द्वारा कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के उन्हीं के संबंध में दिए गए बयानों को लेकर दिया गया। $गौरतलब है कि गत् कुछ दिनों से या यूं कहें कि लोकसभा चुनाव की घोषणा होने से कुछ ही समय पहले गडकरी ने अपने सत्ता विरोधी सुर तेज़ कर दिए हैं और वे एक-दो नहीं बल्कि लगातार कई ऐसे बयान दे चुके हैं जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित पूरी भारतीय जनता पार्टी व अध्यक्ष अमित शाह के लिए मुसीबत खड़ी करने वाले बयान साबित हो सकते हैं। उदाहरण के तौर पर नितिन गडकरी ने अपने एक संबोधन में भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं की ओर मु$खातिब होते हुए कहा था कि-'पार्टी कार्यकर्ताओं को पहले अपनी घरेलू जि़ मेदारियों को पूरा करना चाहिए जो ऐसा नहीं कर सकता वह देश नहीं संभाल सकता। इसी प्रकार गडकरी ने पुणे में आयोजित एक कार्यक्रम में कहा था कि-'नेतृत्व को हार और विफलताओं की भी जि़ मेदारी लेनी चाहिए। सफलता के कई दावेदार होते हैं लेकिन विफलता में कोई साथ नहीं होताÓ। Óसफलता का श्रेय लेने के लिए लोगों में होड़ रहती है लेकिन विफलता को कोई स्वीकार नहीं करना चाहता। सब दूसरे की तर$फ उंगली दिखाने लगते हैं और आपस में दोषारोपण करने लगते हैं जोकि सही नहीं है। विफलता की जि़ मेदारी भी पार्टी नेतृत्व लेÓ। गडकरी का यह बयान राजस्थान,मध्यप्रदेश व छत्तीसगढ़ में भाजपा को मिली शिकस्त के बाद आया था। गडकरी के इस बयान का सभी विश£ेषक यही अर्थ निकाल रहे हैं कि उन्होंने अपने इस बयान से सीधे तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व भाजपा अध्यक्ष अमित शाह पर अपना निशाना साधा है। नितिन गडकरी ने ही हाल ही में यह भी कहा था कि-' जो लोग जनता को सपने तो दिखाते हैं मगर दिखाए हुए सपने पूरे नहीं करते तो ऐसे नेताओं की लोग पिटाई भी करते हैं।Ó
    ज़ाहिर है 'बिल्ली के भाग से छीका टूटने' की आस में बैठे राजनैतिक दलों को नितिन गडकरी में कुछ ऐसा ही नज़र आने लगा है जैसाकि अरूण, यशवंत सिन्हा व शत्रुघ्र सिन्हा में दिखाई दे रहा है यानी कि मोदी-शाह व भाजपा को मात देने के लिए दूसरों के 'कंधों का सहारा'। नितिन गडकरी के इस प्रकार के बयानों को लेकर निश्चित रूप से भारतीय जनता पार्टी का नेत्त्व असहज स्थिति में हैं। परंतु संभवत: उस नेतृत्व को भी भलीभांति  मालूम है कि नितिन गडकरी के इस प्रकार के असहज करने वाले बयान क्यों आ रहे हैं और इन बयानों के पीछे गडकरी को ताकत कहां से हासिल हो रही है। परंतु मोदी सरकार के विरोध का कोई मौका हाथ से न गंवाने वाले राहुल गांधी गडकरी को एक हि मत रखने वाला नेता बता रहे हैं। राहुल गंाधी ने अपने ट्वीट में लिखा था कि-'गडकरी जी बधाई। भाजपा में अकेले आप ही हैं जिसमें हि मत है'। इसके बाद राहुल ने गडकरी से रा$फेल घोटाला, अनिल अंबानी, किसानों की बदहाली तथा संसथाओं की तबाही आदि पर भी कुछ टिप्पणी देने के लिए कहा। परंतु गडकरी को राहुल की तारीफ कतई नहीं भाई। वे जानते हैं कि वे राहुल के समर्थन अथवा सहयोग के मोहताज नहीं हैं। इसीलिए उन्होंने राहुल के तारीफ के ट्वीट के $फौरन बाद ही उनपर यह कहते हुए पलटवार किया कि राहुल जी,हि मत के लिए आपके सर्टि$िफकेट की ज़रूरत नहीं है। एक राष्ट्रीय पार्टी का अध्यक्ष होने के बावजूद आपको प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर हमला करने के लिए 'कंधे' का सहाराÓ लेना पड़ रहा है। उन्होंने लिखा कि हमारी सरकार पर हमला करने के लिए आप जिस तरह सहारा लेरहे हैं उससे आश्चर्य हो रहा है। यही मोदी जी व हमारी सरकार की कामयाबी है कि आपको हमला करने के लिए 'कंधे' ढूंढने पड़ रहे हैं।
                अब आईए 'कंधों की सियासत' के संदर्भ में गत्  दिनों समाजसेवी व गांधीवादी नेता अन्ना हज़ारे के बयान पर भी नज़र डालें। याद कीजिए 2011-14 का वह दौर जब पूरा देश कभी जनलोकपाल के आंदोलन में तो कभी विदेशी काला धन भारत लाने की मांग को लेकर, कभी कोयला घोटाला, 2जी घोटाला, आदर्श घोटाला व कॉमनवेल्थ घोटाले के विरुद्ध तो कभी निर्भया जैसी दुर्भाग्यशाली लड़कियों के बलात्कार को लेकर सड़कों पर इस तरह दिखाई दे रहा था गोया देश में लीबिया जैसी कोई क्रांति आने वाली है। पूरा देश अन्ना हज़ारे के आंदोलन के साथ आश्चर्यजनक रूप से खड़ा हुआ नज़र आ रहा था। इनमें किरण बेदी व जनरल विक्रम सिंह जैसे कई चेहरे भी थे जिन्हें अन्ना आंदोलन में राष्ट्रीय स्वयं संघ की ओर से रोपित किया गया था। यह चेहरे बाद में अपने असली रूप में आ गए और इस समय सत्ता का स्वाद भी चख रहे हैं। देश के राजनैतिक विश£ेषक बड़े $गौर से उस अन्ना आंदोलन को देख रहे थे जिसमें राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ तथा भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता,  कांग्रेस व यूपीए के विरोध में अन्ना हज़ारे के 'कंधों का सहारा' लिए हुए थे। अब गत् दिनों स्वयं अन्ना हज़ारे ने यह बात अपने गांव रालेगण सिद्धि में भूख हड़ताल के दौरान स्वीकार की है। अन्ना ने कहा है कि हां भाजपा ने 2014 में चुनाव जीतने के लिए मेरा इस्तेमाल किया। उन्होंने यह भी कहा कि हर कोई जानता है कि लोकपाल के लिए मेरा आंदोलन ही था जिसने भारतीय जनता पार्टी और आम आदमी पार्टी को सत्ता में पहुंचाया।
अन्ना हज़ारे के ताज़ा-तरीन आंदोलन को शिवसेना तथा महाराष्ट्र नव निर्माण सेना का भी समर्थन हासिल हो रहा है। राज ठाकरे ने तो गत् सोमवार को रालेगण सिद्धि जाकर अन्ना हज़ारे से मुलकात भी कर ली। अर्थात् ठाकरे भी भाजपा के विरुद्ध अन्ना के 'कंधों' का इस्तेमाल करने से गुरेज़ नहीं कर रहे हैं। अर्थात् हम कह सकते हैं कि  जैसे पंजाब में भाजपा को अकाली दल के कंधों की ज़रूरत महसूस होती है तो बिहार में आरजेडी व कांग्रेस के विरुद्ध उन्हीं नितीश कुमार के कंधों की जिनके विरुद्ध मोदी व शाह तथा उनकी पार्टी के नेताओं  द्वारा क्या कुछ नहीं कहा गया। आज भाजपा में लगभग एक सौ के आस-पास सांसद ऐसे हैं जो भाजपाई न होने के बावजूद उनके 'कंधों' पर हाथ रखने की सियासत का ही नतीजा हैं। ऐसे में यदि राहुल ने गडकरी के 'कंधे' का सहारा लिया है तो कोई न कोई गडकरी को भी या तो अपना कंधा बना रहा है या गडकरी स्वयं किसी के कंधे का इस्तेमाल कर लोकसभा चुनाव से कुछ ही समय पूर्व इस प्रकार के 'यथार्थवादी' बयान देने लगे हैं? अत: राजनीति में 'कंधों' के इस्तेमाल के सियासी चलन को रोका नहीं जा सकता।

युवाओं को समाज और देश की उन्नति के लिए कार्य करना चाहिए : प्रो. सुधीर अवस्थी कानपुर। छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय के प्रति कुलपति प्...