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Thursday, June 3, 2021

मिशन अंतरीक्ष की होड़ में पीछे न रह जाये मानव जीवन

इस समय दुनिया की महाशक्तियों में शुमार अमेरिका और चीन के बीच ट्रेड वार के साथ-साथ मिशन अंतरीक्ष पर भी रस्साकसी चल रही है। अमेरिका के जवाब में अभी हाल ही चीन ने भी अपना अंतरीक्ष यान तियानवेन-१ को मंगल ग्रह पर उतारा है। अमेरिका ने भी फरवरी माह में अपना यान परसीवरेंस रोवर उतार चुका है। इस होड़ में खाड़ी के देश यूएई ने भी अपना अंतरीक्ष यान होप प्रोव को इसी वर्ष कामयाबी के साथ मंगल पर उतार चुका है। 

मंगल ग्रह हो या चांद पर पहुंचना या अंतरीक्ष के अन्य रहस्यों को समझना, इसके लिए हमारे वैज्ञानिक बधाई के पात्र हैं, लेकिन ये मिशन जब ज्ञानवद्र्घन के बजाये स्टेटस सिंबल बनने लगे तो इसे मानवता के लिए अच्छा नहीं माना जा सकता है। दिक्कत इससे नहीं है कि ये मिशन नहीं लांच होने चाहिये, दिक्कत इस बात से है कि ऐसे मिशन बहुत खर्चीले होते हैं। एक-एक मिशन में इतने खर्चे आते हैं कि कई देशों के सालाना बजट उससे पूरे हो सकते हैं। 

सोबियत रूस की बर्बादी में एक बड़ा कारण ऐसे मिशन का अंधाधुंध लांच किया जाना भी रहा। वैसे तो उसे कामयाबी कम ही मिली, लेकिन इस मद में उसने अपनी अर्थव्यवस्था तक को ताक पर रख दिया। रूस के बाद अब उसी राह पर चीन भी चल पड़ा है। हैरत तो इस बात की है इस होड़ में खाड़ी के नन्हें से देश यूएई ने भी अपने कदम बढ़ाये हैं। ऐसा लगता है कि ऐसे मिशन से अंतरीक्ष के रहस्यों को जानना कम और स्टेटस सिंबल ज्यादा बनता जा रहा है। भारत ने भी चंद्रयान-१ और चंद्रयान-२ के बाद मंगलयान-१ मिशन पर काम कर चुका है। उसे आशातीत सफलता भी मिली है। 

यह सही है कि विज्ञान और तकनीकी किसी देश की तरक्की के परिचायक होते हैं। इसका उपयोग करके  मानव जीवन को बेहतर किया जा सकता है। जो देश इस मामले में जितना आगे है वह विकास की राह में भी उतना ही आगे माना जाता है। अमेरिका और अब चीन की कामयाबी का राज भी इस क्षेत्र में मिलती सफलताओं में छिपा हुआ है। फिर भी समय की मांग है कि विज्ञान को मानवता की भलाई के लिए उपयोग किया जाये तो ज्यादा बेहतर होता। पिछले डेढ़ वर्ष से पूरी दुनिया कोरोना वायरस के कहर को झेल रही है। करोड़ों लोग इस वायरस के खूनी पंजों में जकड़कर अपनी जान गंवा चुके हैं। दुनिया भर में त्राहि-त्राहि हो चुकी है। इस वायरस ने यह भी हमें जता दिया कि मानवता की रक्षा के लिए हमारी तैयारियां अभी मुक्कमल नहीं है। अमेरिका और चीन भी इस महामारी की मार झेल रहे हैं। चीन से फैले इस वायरस के खतरे को समझा ही नहीं जा सका और जब तक इसके खतरे के बारे में समझा जाता, बहुत देर हो चुकी थी। अत: आपदा से सीख लेते हुए हमारा यह प्रयास होना चाहिये कि हम अपनी विज्ञान और तकनीकी ज्ञान का उपयोग लोगों की जीवन रक्षा और उनके जीवन स्तर को बढ़ाने के लिए किया जाना चाहिये। 

ऐसा नहीं है कि अमेरिका और चीन में गरीब नहीं है या वहां हर तरफ खुशहाली ही खुशहाली है। भारत के मामले में यह स्थिति और भी विकट है। अभी कोरोना की दूसरी लहर में सबने जो मौत का तांडव देखा, वह आंख खोलने वाली होनी चाहिये। आयुषमान भारत और स्वास्थ्य बीमा समेत कई योजनाओं के होने के बावजूद लोगों को समय से इलाज नहीं मिल सका। यह कहना समयोचित होगा कि देश में बहुत से लोग वायरस से नहीं बल्कि इलाज न मिलने के कारण अपनी जान गंवा बैठे। अभी महीने भर पहले पूरे देश में हाहाकार मचा था। अस्पतालों के बाहर कोरोना वायरस के पीडि़तों की लम्बी कतार थी, लेकिन उन्हें बेड मयस्सर नहीं हो रहा था। तमाम दवाओं के साथ जरूरी चीजों की जमाखोरी और कालाबाजारी भी लोगों ने देखा। 

ऐसी स्थिति से समय रहते बचा जा सकता था, यदि इस बारे में हमारी विज्ञान और तकनीकी का न्यायोचित ध्यान गया होता। हमें पहले से ही अंदेशा था, लेकिन हमने तैयारी नहीं की। हमें भी अंतरिक्ष मिशन बढ़ाना चाहिये, लेकिन वह शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सड़क, यातायात, संचार जैसी मूलभूत सुविधाओं की अनदेेखी के बिना पर नहीं होना चाहिये। हमारा ध्यान लोगों के जीवन स्तर सुधारने पर मुख्य रूप से होना चाहिये।

Monday, May 10, 2021

जन माध्यम समाचार पत्र समूह के एक युग का अंत (सम्पादकीय)

अलविदा 
जन माध्यम समाचार पत्र के लिए सोमवार काला दिन साबित हुआ। समाचार पत्र की संस्थापिका एवं प्रथम संपादक रहीं श्रीमती निलोफर अहमद हम सभी को छोड़कर इस दुनिया को अलविदा कह दी। वह भले ही हमारे बीच नहीं रहीं, लेकिन उनके बताये मार्गदर्शन और नीतियां सदैव हम सभी के बीच प्रेरणास्रोत का कार्य करेंगी। आज जन माध्यम जिस मुकाम पर है, वहां तक पहुंचाने में उनकी बड़ी भूमिका रही है। उनके देहावसान से जन माध्यम के एक युग का अंत हो गया। इस तरह से हम सबके बीच से उनका चले जाना समाचार पत्र समूह के लिए अपूर्णनीय क्षति है। 

झांसी में जन्मी श्रीमती अहमद शुरू से प्रतिभाशाली रहीं। शुरूआती शिक्षा गृह जनपद से प्राप्त करने के बाद उन्होंने कश्मीर विश्वविद्यालय से स्नातक और बीएड की शिक्षा-दीक्षा ग्रहण की। आईपीएस अधिकारी प्रोफेसर मंजूर अहमद के साथ निकाह के बाद दोनों ने मिलकर समाज के गरीब और जरूरतमंदों की फिक्र में हर संभव मदद का बीड़ा उठाया। उन्होंने इस दौरान आईपीएस वाइव्स एसोसिएशन से जुड़कर महिला अधिकारों, शिक्षा-दीक्षा और जागरूकता के विभिन्न कार्यक्रमों में बढ़ चढ़कर भागीदारी की। ईद, बकरीद जैसे विभिन्न पर्वों पर किसी गरीब के घर मायूसी न रहे, इसकी दोनों लोगों ने भरपूर कोशिश की। खाने के साथ-साथ नये कपड़ों तक का प्रबंध हर वर्ष किया जाना जैसे उनके नितांत जरूरी कार्यों में शुमार था। 

अपनी बीएड की शिक्षा का सदुउपयोग करते हुए उन्होंने फरीदाबाद में एक इंटर कालेज की स्थापना भी की, जिसके माध्यम से गरीब बच्चों को सस्ती और बेहतर शिक्षा मुहैया कराने का उनका ध्येय था। वे कभी भी कालेज में अकेले न भोजन करके हमेशा छात्रों के साथ ही भोजन किया करती थीं। आज भी वह स्कूल अनवरत अपने मिशन पर चल रहा है।

2010 की बात है, उनके दिमाग की ही उपज थी कि समाचार पत्र के माध्यम से ज्यादा से ज्यादा लोगों के बीच जागरूकता फैलायी जा सकती है। इसी का परिणाम जन माध्यम समाचार पत्र समूह रहा। जून 2010 में लखनऊ से इसका पहली बार प्रकाशन शुरू हुआ और समाचार पत्र के पहले अंक से संपादन का दायित्व श्रीमती निलोफर अहमद से संभाल लिया। जब मीडिया में पेड न्यूज, सनसनी, विज्ञापन और पीत पत्रकारिता का बोलबाला था, तब जन माध्यम ने विशुद्ध रूप सकारात्मक पत्रकारिता के माध्यम से मिसाल कायम करने का कार्य किया। समाचार पत्र में उन्होंने कभी भी प्रथम पïृष्ठ पर विज्ञापन नहीं छापा। उनका स्पष्टï मत था कि समाचार पत्र की पहचान उसकी सकारात्मक खबरों के दम पर होता है और इससे जन माध्यम कभी समझौता नहीं करेगा। उन्हीं की अगुवाई में समाचार पत्र ने अपना मेरठ, नई दिल्ली, पटना और रांची का संस्करण भी शुरू किया। बाद में अस्वस्थता की वजह से जब उन्होंने संपादन का दायित्व छोड़ा तब भी उनकी पैनी नजर समाचार पत्र के सभी खबरों और संपादकीय पर बनी रहती थी। 

आज वे हमारे बीच नहीं रहीं, लेकिन उनके दिखाये रास्ते पर जन माध्यम समाचार पत्र भविष्य में भी अपना सफर जारी रखेगा। गरीबों, जरूरतमंदों की आवाज के लिए जन माध्यम के पन्नों में हमेशा जगह खाली रहेगी। उनकी कमी को पूरा नहीं किया जा सकता, लेकिन उनके दिखाये मार्गों पर चलना ही उनके लिए सच्ची श्रद्धांजलि होगी। विनम्र श्रद्धांजलि!

Friday, April 9, 2021

राष्ट्रीय सुरक्षा कानून का रूटीन इस्तेमाल


प्रोफेसर मंजूर अहमद 
(सेवानिवृत आईपीएस) 

पूर्व कुलपति, डॉ. भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय, आगरा

राष्ट्रीय सुरक्षा कानून एक बहुत ही सख्त कानून है, जिसके अन्तर्गत गिरफ्तार व्यक्ति को बिना चार्जशीट के महीनों तक जेल में रहना पड़ सकता है। इसका इस्तेमाल सामान्य हालातों में किया जाये तो उससे नागरिकों की आजादी पर बहुत बुरा असर पड़ेगा। प्रक्रिया में जिला मजिस्ट्रेट की सहमति के बाद ही यह गिरफ्तारी होती है और यह उम्मीद की जाती है कि जिला मजिस्ट्रेट ने प्रत्येक मामला जो उनके सामने आता है उसमें उचित जांच-पड़ताल और ध्यान से देखा होगा। दुख इसका है कि ऐसा नहीं होता। पुलिस की प्रथम सूचना रिपोर्ट एफआईआर देखने पर मालुम हो सकता है कि यह मामला राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के अंतर्गत आता है कि नहीं आता। 

अभी पिछले दिनों इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बहुत से मामलों में रासुका के अन्तर्गत कायम हुए मामलों को रद कर दिया और पिछले कुछ महीनों में ९४ व्यक्तियों के विरूद्घ रासुका इस्तेमाल रद किया। इससे एक बात तो स्पष्ट थी कि जिला मजिस्ट्रेट से जो उम्मीद थी कि वह नागरिकों की आजादी और सामाजिक सुरक्षा के बीच संतुलन रखेंगे, वह पूरी नहीं हुई। जिला मजिस्ट्रेट लोगों ने आंख बन्द करके पुलिस से आयी रिपोर्ट पर हस्ताक्षर किये और जिन मामलों में राष्ट्रीय  सुरक्षा का पहलू नहीं था, उनमें लोग जेल चले गये। 

यह राष्टï्रीय सुरक्षा कानून एक अत्यंत संवेदनशील मामला है और इसे पुलिस ने रूटीन का मामला बना दिया है। एक जांच के अनुसार १२० राष्ट्रीय  सुरक्षा कानून के मामलों में आधे से अधिक गोवध और साम्प्रदायिक तनाव से संबंधित थे। गोवध के लिए अलग से कानून है और उसका राष्टï्रीय सुरक्षा से कोई संबंध नजर नहीं आता। यदि किसी ने गोवध का कानून तोड़ा है तो उसी कानून के अंतर्गत उसकी गिरफ्तारी होनी चाहिये और गोवध के मामलों में भी जमानत का मजबूती से विरोध होना चाहिये। परन्तु हर मामले को राष्टï्रीय सुरक्षा का मामला बनाना उचित नहीं है। रासुका के अंतर्गत लोगों को गिरफ्तार करके रखना उचित नहीं लगता जब तक कि कोई राष्टï्रीय सुरक्षा का मामला नहीं बनता हो। रासुका के मामलों में राष्ट्रीय  सुरक्षा और नागरिक की आजादी के बीच अत्यंत महत्वपूर्ण संतुलन रखना आवश्यक है और जिस तरह पुलिस मौका बेमौका इस कानून का इस्तेमाल कर रही है, कोर्ट ने इस पर ही सवाल उठाया है। 

२०१९ के एक मामले (शाहिद कुरैशी वर्सेज स्टेट ऑफ यूपी) में राष्ट्रीय सुरक्षा कानून पर विस्तृत टिप्पणी की थी। इस संबंध में पुलिस और जिला मजिस्ट्रेट ने उच्चतम न्यायालय के स्पष्ट निर्देशों की भी अवहेलना की है। यह तो अच्छा है कि उच्च न्यायालय ने नागरिकों की आजादी की स्वतंत्रता और संविधान द्वारा दी गई गारंटी को लागू करने में बहुत सकारात्मक भूमिका अदा की है। परन्तु इतनी बात तो साफ है कि कानून बनाते समय जो उम्मीद जिला मजिस्ट्रेट से की गई थी, वह पूरी नहीं हुई है। कई मामलों में तो यहां और साउथ दिल्ली के मामलों में पाया गया कि एक ही भाषा की एफआईआर विभिन्न मामलों में लिखायी गयी है, जिसे अंगे्रजी में कट एंड पेस्ट कहा जाता है। यदि उच्च अधिकारी ध्यान देते तो ऐसा नहीं होता। 

Thursday, April 8, 2021

कोरोना वायरस की लड़ाई के लिए नई रणनीति आवश्यक


प्रोफेसर मंजूर अहमद 
(सेवानिवृत आईपीएस) 

पूर्व कुलपति, डॉ. भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय, आगरा

देश में विशेषकर औद्योगिक क्षेत्रों में जिस तरह कोरोना वायरस फैल रहा है, उससे विकास की पूरी प्रक्रिया बैठती हुई नजर आ रही है। पहले के मुकाबले में इस बार यह रफ्तार बहुत तेज है। एक विशेष बात यह भी है कि अब यह बीमारी शहरों से निकल कर गांवों की तरफ जा रही है। पिछली बार जिस तरह इस महामारी ने रोजगार और लोगों की खुशहाली पर कुठाराघात किया था, इस बार उससे अधिक सख्त मामला नजर आ रहा है। एक बात यह भी है कि पिछली बार जब लॉकडाउन हुआ तो लोगों ने बहुत परेशानी के बावजूद उसे झेला। विशेषतौर से प्रवासी मजदूरों का हाल बेहाल हुआ। उसने सरकारी तंत्र को बदनाम करके रख दिया। 

इस बार लोग इसके लिए तैयार नहीं हैं। लोगों में एक अविश्वास और थकान का भाव नजर आ रहा है। लोग न तो मास्क पहन रहें हैं और न उचित सामाजिक दूरी का ध्यान रख रहे हैं। यही नहीं लोगों ने भीड़ वाली जगहों पर जाना भी कम नहीं किया है। बाजारों में हर वक्त बिना मास्क पहने लोगों की भीड़ नजर आती है। पिछले दिनों बिहार में एक कोचिंग सेंटर में जब पुलिस ने विद्यार्थियों से जमा नहीं होने को कहा तो विद्यार्थियों ने पुलिस को खदेड़ दिया। उनका कहना था कि अगर राजनेता रैलियां कर रहे हैं और उससे यह महामारी नहीं फैल रही है तो हमें अपने कोचिंग सेंटर में पढऩे से क्यों रोका जा रहा है। यही बात कृषि कानूनों के विरूद्घ प्रदर्शन कर रहे दिल्ली के चारों तरफ किसानों ने भी कही। यद्यपि प्रधानमंत्री और अन्य लोग मौका बेमौका इस महामारी से बचने की तरकीबें दोहराया करते हैं, परन्तु लोग मानने को तैयार नहीं है। इसका एक बुनियादी कारण लोगों में अविश्वास है। यदि राजनेता स्वयं अपनी बात पर कायम रहते और वैसा ही आचरण करते तो शायद यह स्थिति नहीं होती।

यह बीमारी इस स्थिति में आ गयी है कि अब केवल रत्रिकालीन कफ्र्यू से रूकने वाली नहीं है। रात्रिकालीन कफ्र्यू से सरकार क्या फायदा उठाना चाहती है यह समझ में नहीं आता। यदि लोग दिन में भीड़-भाड़ वाली जगहों पर लोग बिना मास्क लगाये और उचित दूरी नहीं रखते हुए लोग जमा होते हैं तो रात के कफ्र्यू का कोई अर्थ नहीं रह जाता है।

इस समय सरकार इस पर सोचें कि आम नागरिक को कैसे विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा जारी किये गये निर्देशों पर लाया जाये। इसके लिए एक सुझाव यह भी है कि जिन लोगों ने पांच राज्यों की विधान सभाओं के चुनाव में अपना पूरा समय और शक्ति झोंक दी है, वह किस हद तक लोगों में घूमकर ऐसा माहौल तैयार करने का प्रयास करेंगे। जिससे ध्यान चुनाव से हटकर स्वास्थ्य की तरफ जाये। इन पांच राज्य विधानसभाओं में कम से कम तीन (केरल, तमिलनाडु, पुड्डूचेरी) ऐसी हैं, जिनमें केन्द्र सरकार को जीत की आशा नहीं होगी। यदि राजनीतिक कार्यकर्ता गांव में घूम घूमकर लोगों को शिक्षित करते तो ज्यादा फायदा होता। इस महामारी का मुकाबला जनशक्ति के द्वारा ही हो सकता है। सरकारी आदेशों से नहीं हो सकता। 

आज से करीब १४०० साल पहले जब अरब के हिस्से में प्लेग फैला तो इस्लाम के पैगम्बर मोहम्मद साहब ने दो-तीन निर्देश दिये।

१. जो लोग प्लेग वाले क्षेत्र में हों, वे वहां से बाहर न जायें, वहीं रहें।

२. बाहर के लोग प्लेग ग्रसित क्षेत्रों में न जायें।

3. लोग सब्र और यकीन के साथ हिम्मत से जीयें।

पूरे समाज ने अक्षरश: पालन किया और प्लेग की बीमारी नहीं फैली और थोड़े दिनों में खत्म हो गई। एक ऐसा माहौल तैयार किया जाना चाहिये, जैसा मोहम्मद साहब ने तैयार किया था, जैसा कि लोगों ने आंख मूंदकर उनके निर्देशों पर अमल किया। क्या ऐसा कोई राजनेता है जो गांधी जी की तरह लोगों को दांडी मार्च की तरह इस बीमारी को हराने के लिए तैयार कर सके।

Sunday, March 7, 2021

राष्ट्रपति जो बाइडेन के सामने चुनौतियां (सम्पादकीय)

प्रोफेसर मंजूर अहमद (सेवानिवृत आईपीएस) 

पूर्व कुलपति, डॉ. भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय, आगरा

राष्ट्रपति जो बाइडेन ने २० जनवरी को अपने पद की शपथ ले ली थी, परन्तु अब उनके सामने बहुत बड़ी चुनौतियां हैं।

अमेरिकी समाज साफ दो हिस्सों में बंटा हुआ है और तथाकथित अमेरिकी स्वप्न धूल में मिल गया है। अमेरिका बाहर से आये हुए लोगों द्वारा बनाया गया एक कृत्रिम देश है और यदि नस्ली बुनियाद पर वह समाज बंटे तो यह बहुत खतरनाक हो सकता है। इतिहास का सबसे शक्तिशाली देश (सामरिक और आर्थिक दोनों दृष्टिïकोण से) यदि नस्लपरस्ती के रास्ते पर चले तो यह पूरे संसार के लिए खतरनाक है। उसे परास्त करना उतना आसान नहीं है, जितना जर्मनी को परास्त करना था। डोनाल्ड ट्रम्प ने ह्वïाइट सुपरमासिस्ट (अतिवादी राष्टï्रीयता) को बढ़ावा दिया और उन लोगों के प्रोत्साहित किया, जो अमेरिका में श्वेत नस्ल को असली नागरिक मानते थे। कू-क्लक्स-क्लान की तरह ही एक अतिवादी श्वेत नस्ल की उच्चता का बखान करने वाले रश हडसन लिम्बाग को उन्होंने राष्टï्र का सर्वोच्च मेडल दिया। अमेरिका के सभी प्रगतिशील लोग हैरान हो गये कि यह व्यक्ति किस तरह मेडल फ्रीडम का हकदार बना, जबकि उसे जेल में होना चाहिये था। आरोप है कि ६ जनवरी को संसद भवन पर हुए हमले को भी इस आदमी ने प्रोत्साहित किया था। डोनाल्ड ट्रम्प के अमेरिका ने मुस्लिम देशों से आने वाले लोगों पर पाबंदी लगायी, जिससे श्वेत नस्लवादी और मजबूत हुए। अमेरिकी समाज का एक अच्छा खासा हिस्सा ६ जनवरी की घटनाओं की निन्दा नहीं करता और संसद पर हमले में कुछ अधिकारी भी शामिल थे, यह बात जांच में साबित हो गयी है। 

ह्वïाइट हाउस से जाने के बाद भी डोनाल्ड ट्रम्प का दमखम वही है और उन्होंने अभी कुछ दिन पहले रिपब्लिकन पार्टी के अपने चाहने वालों की एक बैठक में यह ऐलान किया कि वह राजनीति में ही रहेंगे और शायद २०२४ के राष्टï्रपति पद का चुनाव भी लड़ेंगे। जिस तरह की भाषा का प्रयोग उस बैठक में हुई, उससे ऐसा लगता है कि रिपब्लिकन पार्टी के भी जिन लोगों ने जो बाइडेन का साथ दिया था, वे भी डोनाल्ड ट्रम्प के निशाने पर हैं। सीनेट जो बहुत महत्वपूर्ण चैम्बर है, में रिपब्लिकन और डेमोक्रेट बराबर बराबर संख्या में हैं।

अमेरिकी शिक्षा संस्थानों में भी जो बाइडेन को नस्लपरस्ती के विरूद्घ कार्रवाई करनी पड़ेगी। जो बाइडेन को फूंक फूंक कर कदम रखना होगा, क्योंकि आर्थिक स्थिति खराब होने पर २०२४ में उनका चुनाव खतरे में पड़ सकता है। उन्हें अमेरिकी समाज को एक बार प्रगतिशील और नस्ली समानता के मानने वाले तबके को एकत्रित करना पड़ेगा, ताकि वह अमेरिका को उस खतरनाक रास्ते पर जाने से रोक सकें , जो डोनाल्ड ट्रम्प ने सुझाया था।

Thursday, March 4, 2021

म्यांमार में फौजी शासन द्वारा आम लोगों का दमन


प्रोफेसर मंजूर अहमद 
(सेवानिवृत आईपीएस) 

पूर्व कुलपति, डॉ. भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय, आगरा

म्यांमार में स्थिति बहुत गंभीर हो रही है। फौज ने अब लोगों को दुश्मन की तरह मारना शुरू कर दिया है। तख्तापलट के बाद शुरू के दो दिनों में आंदोलनकारियों को विरोध-प्रदर्शन की थोड़ी आजादी थी, परन्तु फिर फौज ने अपने गुण्डे भेजकर लोगों पर हमला कराना शुरू किया और अब फौज खुद लोगों पर फायरिंग कर रही है, जिससे लोग बड़ी संख्या मे हताहत हो रहे है। जाहिर है कि ऐसी स्थिति में आम जनता बहुत दिनों तक नहीं लड़ सकती। 

फौज की यह बेरहमी कोई नई नहीं है। अभी पांच साल पहले इसी फौज ने राखिने प्रांत में सैकड़ों गांवों को जला दिया था। अब चिन प्रांत में ईसाई अल्पसंख्यकों के साथ ज्यादती हो रही है और चिन लोगों ने अपनी गुरिल्ला फौज बनाकर म्यांमार की फौज से लडऩा शुरू कर दिया है। ऐसे कई राज्यों में यही हालत है और कभी किसी ने फौज की ज्यादती के खिलाफ आवाज नहीं उठायी। 

एक जर्मन चिंतक ने एक बार कहा था कि जब नाजी लोग कम्युनिस्टों को पकडऩे आये तो मै नहीं बोला, क्योंकि मै कम्युनिस्ट नहीं था। जब वे ट्रेड यूनियनिस्ट को पकडऩे आये तो मै चुप था कि क्योंकि मैं ट्रेड यूनियनिस्ट नहीं था। फिर जब वे यहूदियों को पकडऩे आये, तब मै चुप रहा, क्योंकि मै यहूदी नहीं था और जब वे मुझे पकडऩे आये तो मुझे बचाने वाले वाला कोई नहीं था। इस कथानक का अर्थ यह है कि जब भी कहीं ज्यादती हो तो सबको मिलकर उसका विरोध करना चाहिये। जब रोहिंग्या के ऊपर ज्यादती हो रही थी, तब सू की चुप रहीं और कई मौकों पर फौजी कार्यवाही का बचाव किया। आज कल बौद्घिस्ट लामा फौज के खिलाफ बोल रहे हैं, परन्तु रोहिंग्या और अन्य अल्पसंख्यक समूहों के विरूद्घ फौजी कार्यवाही को उन्होंने मजबूत समर्थन दिया। यदि म्यांमार के लोग शुरू से इन ज्यादतियों के विरूद्घ आवाज बुलंद करते तो फौज की आम लोगों के साथ इतनी ज्यादती की हिम्मत नहीं होती।

म्यांमार के विरूद्घ सारी दुनिया खड़ी हो रही है। संयुक्त राष्टï्र संघ में म्यांमार के प्रतिनिधि ने फौजी शासन के खिलाफ जनता का मजबूत पक्ष रखा है। अमेरिका ने फौज के अधिकारियों पर पाबंदी लगायी है और म्यांमार की पूरी फौज को आतंकी संगठन घोषित कर दिया। ऐसा इतिहास में बहुत कम हुआ। 

वे देश जो म्यांमार के साथ वाणिज्य संबंध रखते थे, उन्होंने भी हाथ खींचना शुरू कर दिया। म्यांमार में सबसे अधिक निवेश सिंगापुर का था, दो दिन पहले सिंगापुर ने घोषणा कर दी है कि अब वह इन हालातों में म्यांमार से कोई संबंध नहीं रखेगा। भारत ने भी प्रजातंत्र के खिलाफ इस खुली कार्रवाई की निन्दा की है और उसने भी इन जनरलों के बचाव से अपने को दूर रखा। ले देकर अब केवल चीन बचा है, जो अब भी म्यांमार के हालात को उसका आंतरिक मामला कहकर चुप है। चीन में प्रजातांत्रिक मूल्यों की कोई बुनियाद नहीं है, इसलिए उसका बर्ताव समझ में आता है, परन्तु म्यांमार के हर तरफ पड़ोसी देश इस सैनिक शासन के विरूद्घ हैं। म्यांमार पर लगायी गई पाबंदियों का कुप्रभाव सबसे ज्यादा आम लोगों पर ही होगा, यह भी एक दुखद सत्य है। जितनी जल्दी इस फौजी शासन का अंत हो, उतनी जल्दी म्यांमार के लोगों का जीवन आसान होगा। परन्तु इस पूरी घटना से यह सबक मिलता है कि अपनी आजादी की रक्षा के लिए नागरिकों को हर समय सचेत रहना चाहिये और किसी के साथ भी ज्यादती हो तो उसका विरोध करना चाहिये।

Wednesday, February 24, 2021

क्षेत्रीय विदेश नीति का पुनरीक्षण जरूरी है


प्रोफेसर मंजूर अहमद 
(सेवानिवृत आईपीएस) 

पूर्व कुलपति, डॉ. भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय, आगरा

दक्षिण पूर्व एशिया में हमारी विदेश नीति कितनी कामयाब है, इसे देखने की आवश्यकता है। इन देशों में पाकिस्तान से हमारी पुरानी नाराजगी जगजाहिर है। बाकी देशों से भी संबंध सुधरते नजर नहीं आते। हमने अमेरिकी और पश्चिमी देशों के दबाव में म्यांमार के मामले में जो नीति अपनायी है, वह चाहे नैतिक आधार पर जितना भी सही हो, लेकिन उससे हमें कोई फायदा नहीं होगा। बांग्लादेश से भी संबंध पहले जैसे नहीं है। बांग्लादेश बेल्ट एण्ड रोड इनीशिएटिव में चीन के साथ जा रहा है और उसमें चीनी निवेश बढ़ रहा है। श्रीलंका ने पहले दक्षिण श्रीलंका के एक बंदरगाह के मामले में हमारे साथ हुए समझौते को रद कर दिया, जिससे उसी का फायदा था। अब उत्तरी श्रीलंका में जाफना के पास हमारी सीमा से केवल ५० किलोमीटर की दूरी पर एक संयंत्र के निर्माण में हमारी आर्थिक मदद की जगह चीन से कर्ज लेना श्रेष्यकर समझा। यह अत्यंत खेदजनक था। श्रीलंका से थोड़ी दूर पर स्थित मालद्वीव में हमारे विदेश मंत्री जयशंकर गये थे और उन्होंने मालद्वीव से एक सामरिक रूप से अहम समझौता किया था। यह समझौता उनके और मालद्वीव की विदेश मंत्री सुश्री मरियम दीदी के बीच हुआ था, परन्तु संसद में इसका विरोध हो रहा है। ८० सांसदों में से ५१ ने इस पर विस्तृत बहस के लिए नोटिस दे रखा है और अब इस समझौते के मूल रूप में क्रियान्वयन की कोई उम्मीद नहीं है। सांसदों ने विशेष रूप से इस पर जोर दिया है कि किसी भी हाल में मालद्वीव की जमीन पर किसी विदेशी फौज का बूट नहीं पडऩे दिया जायेगा। इससे पहले भारत ने तट रक्षा के लिए दो हेलीकाप्टर दिये थे, परन्तु उन्हें भी मालद्वीव ने इसी बुनियाद पर लौटा दिया था। पाकिस्तान और चीन से तो हमारे संबंध खराब हैं ही, इधर हमने अमेरिकी दबाव में ईरान से भी संबंध खराब कर लिये हैं और इस कारण अब पाकिस्तान और ईरान काफी नजदीक आ रहे हैं। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान का श्रीलंका का दौरा हमें इस क्षेत्र में अलग-थलग करने की एक कोशिश है। कोविड-१९ के कारण देश में बाहरी देशों द्वारा निवेश भी बहुत कम हो गया है। इसका कारण यह है कि लगभग सभी देशों में इस महामारी की वजह से आर्थिक संकट है। चीन अकेला देश है, जो इस समय भी निवेश कर रहा है, परन्तु हमने उसके द्वारा देश में निवेश पर बहुत प्रतिबंध लगा दिया है। २०१९-२० में चीन साढ़े तीन बिलियन डॉलर का नया निवेश किया था, जो इस साल घटकर उसके आधे से भी कम १.५ बिलियन डॉलर रह गया है। अर्थशास्त्रियों का विचार है कि सीमा पर तनाव अपनी जगह है, परन्तु निवेश रोकने का कोई तार्किक कारण नजर नहीं आता, क्योंकि इसमें हम लोगों का ही फायदा था। चीन और रूस के नजदीक आने से रूस से भी हमारे संबंध अब वैसे नहीं रह जाएंगे, जैसे कि पहले थे। नेपाल से हमारा तनाव चल रहा है और इसके पीछे चीनी कूटनीति ही है। ले देकर केवल नन्हा भूटान ही हमारे साथ है, परन्तु वहां भी राजनीतिक लोगों का एक समूह हमारे द्वारा भूटान की नीतियों पर नियंत्रण के विरूद्घ खड़ा हो रहा है। यह समूह अन्य देशों में भूटान के दूतावास खोले जाने का पक्षधर है।

यदि हम अपने आस-पास के देशों से संबंध नहीं सुधार सकते तो फिर हिन्द पैसेफिक या क्वाड का कोई बहुत महत्व नहीं रह जाता। अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था कि आप पड़ोसी नहीं बदल सकते। उनके साथ आपको रहना ही है तो संबंध ठीक करना आवश्यक ही है। 

Tuesday, February 23, 2021

पेट्रोल-डीजल की कीमतों में अभूतपूर्व बढ़ोत्तरी


प्रोफेसर मंजूर अहमद 
(सेवानिवृत आईपीएस) 

पूर्व कुलपति, डॉ. भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय, आगरा

पेट्रोल-डीजल की कीमतें प्रतिदिन बढ़ती जा रही हैं। पेट्रोल-डीजल देश में इतना महंगा कभी नहीं रहा जितना कि आजकल हो गया है। जबकि पूर्व में कच्चे तेल की कीमतें भी अधिक रहीं हैं। इन कीमतों का असर देश के हर तबके पर है।

बढ़ी हुई पेट्रोल की कीमतों का बोझ मध्यम वर्ग, नौजवानों और विद्यार्थियों पर है। अब आप सड़क पर देखेंगे तो शायद ही कोई साइकिल चलाने वाला नजर आयेगा। नौजवान और विद्यार्थी मोटर बाइक से चलते हैं और पेट्रोल की बढ़ी कीमतों का सीधा असर उन पर है। डीजल की बढ़ी कीमतों का असर किसानों पर है, जिनके ट्रैक्टर और पंपसेट उससे ही चल रहे हैं। शहरों में विशेषकर छोटे शहरों में बिजली की हालत सबको मालुम है और लोग पंपसेट का इस्तेमाल पानी निकालने के लिए या इनवर्टर की बैटरियां चार्ज करने के लिए करते रहते हैं। किसानों के ट्रैक्टर्स में सबसे अधिक डीजल का इस्तेमाल होता है और इसके कारण कृषि पर खर्च बढऩा अवश्यंभावी है। पिछले साल जब सभी क्षेत्रों में विकास दर ऋणात्मक में चला गया था, तब केवल कृषि ऐसा क्षेत्र था, जिसमें विकास दर में तीन प्रतिशत की बढ़ोत्तरी दर्ज की गई थी। अब डीजल की कीमतों और किसान आंदोलन के कारण शायद वह बढ़ोत्तरी कायम न रह सके। ट्रकों का किराया डीजल के रेट बढऩे से बढ़ जायेगा और माल लाने-ले जाने का खर्च भी बढ़ जायेगा, जिससे कृषि उत्पाद महंगे हो जाएंगे। वैसे भी डीजल के महंगे होने से महंगाई हर क्षेत्र में बढ़ेगी। 

जैसा सब लोग जानते हैं कि यह महंगाई सरकारों द्वारा ऊंचे दर पर टैक्स लगाने के कारण है। हमारे पड़ोसी देशों में पेट्रोल-डीजल की कीमतें हमारे मुकाबले में बहुत कम है। नेपाल में पेट्रोल-डीजल हमारे यहां से ही जाता है, परन्तु वहां कीमतें हमारी आधी हैं। 

सरकार की मजबूरी है, क्योंकि प्रत्यक्ष कर की उगाही कम हुई है और निर्यात से भी कम पैसे आ रहे हैं। सरकारी खर्च बढ़ता जा रहा है और सरकार ऊंचा टैक्स लगाकर उसे पूरा करने का प्रयास कर रही है। तेल बेचने वाली कंपनियों ने भी इस मौके का फायदा उठाना शुरू कर दिया है। कुछ लोगों का विचार है कि यह कंपनियां आने वाले खराब दिनों के लिए संसाधन जोड़ रहीं हैं। 

विपक्षी दलों को सरकार पर हमला करने का एक अच्छा मौका मिल गया है। विपक्ष भाजपा नेताओं के पुराने भाषणों और दावों को दुहराते हुए सरकार पर हमला कर रहा है। सरकार की दोहरी टैक्स नीति के कारण भी हालात खराब हो रहे हैं। अब तो राज्य सरकारें यह कहने लगी हैं कि यदि केन्द्र सरकार अपने टैक्स में कमीं करे तो वह कमी करने को तैयार हैं। 

दो दिन पहले वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने स्वयं कहा था कि तेल की बढ़ी हुई कीमतें परेशान करने वाली हैं और इस संबंध में केन्द्र और राज्यों को बैठकर फैसला करना चाहिये। कीमतों को रोकना और कम करना जरूरी है, अन्यथा विकास दर और नीचे जायेगा। विकास दर में अभी हम वियतनाम, बांग्लादेश जैसे देशों से भी नीचे हैं। 

Monday, February 22, 2021

एनआईए द्वारा भीमा कोरेगांव मामले में साक्ष्य की सत्यता पर शक


प्रोफेसर मंजूर अहमद 
(सेवानिवृत आईपीएस) 

पूर्व कुलपति, डॉ. भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय, आगरा

भीमा कोरेगांव मामले में आम लोगों की जानकारी बहुत सीमित है और इस मुकदमें की तफ्तीश के मामले में भी केवल गिरफ्तार लोगों की जमानत के बारे में लोग बात करते हैं। आवश्यक यह है कि इस मुद्दे पर जो बातें सामने आयीं है, उन्हें देश के सामने रखा जाये। जैसा सभी जानते है कि आज से २०० साल पहले पूने के इस गांव में इस्ट इंडिया कंपनी और पेशवा की फौज के बीच युद्घ हुआ था। इस्ट इंडिया कंपनी की फौज में अच्छी संख्या में महार (दलित) लोग भी थे और उन्होंने युद्घ बहुत बहादुरी का प्रदर्शन किया थ। जीत इस्ट इंडिया कंपनी की हुई और बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर ने अंगे्रजों के साथ दूसरी राउण्ड टेबल कांफ्रेंस में दलितों के इस योगदान की याद दिलायी। तीन साल पहले बड़े पैमाने पर इस युद्घ की यादगार मनाने का फैसला दलितों ने किया, जिस पर वहां दंगा भड़क गया और दंगे में हिन्दुत्व के दो व्यक्ति नामजद हुए, जिनमें से एक ही अभियुक्त गिरफ्तार हो पाया। 

इस दंगे की जांच पूने की ग्रामीण पुलिस ने शुरू किया और बाद में इसे नगर पुलिस और फिर एनआईए ने जांच की। एनआईए ने १५ व्यक्ति के विरूद्घ कार्रवाई की, जिनके बारे में एनआईए ने सूचित किया कि इनका संबंध प्रतिबंधित कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओइस्ट) से है और वे देश के विरूद्घ काम कर रहे थे। एनआईए ने यह भी कहा कि यह लोग देश के प्रधानमंत्री को शारीरिक नुकसान (हत्या) पहुंचाने की योजना बना रहे थे। अभियुक्तों में से एक वरवरा राव की जमानत कल हाईकोर्ट द्वारा हो गई। बाकी लोग जेल में हैं। यह सभी लोग विभिन्न पृष्ठïभूमि के हैं और यकीन करना मुश्किल है कि विभिन्न पृष्ठïभूमि के अलग-अलग जगहों के लोग प्रधानमंत्री की हत्या की साजिश कर रहे थे। एक अभियुक्त जेस्यूट प्रीस्ट फादर स्टैन स्वामी का संबंध कम्युनिस्टों से होगा, यह विश्वास करने में बहुत दिक्कत है। एक महिला रोना विल्सन भी गिरफ्तार हुई और उनका कम्प्यूटर पुलिस ने कब्जे में लिया। रोना विल्सन के कम्प्यूटर में कुछ चि_िïयां थी, जिनकी बुनियाद पर एनआईए इस नतीजे पर पहुंंची कि ये लोग प्रधानमंत्री की हत्या की साजिश रच रहे थे। रोना विल्सन के कम्प्यूटर की जांच बोस्टन के एक मशहूर एक्सपर्ट मार्क स्पेंसर से करवाई गयी तो यह पाया गया कि यह चि_िïयां मिस विल्सन के कम्प्यूटर में अलग से बड़ी चालाकी से मालवेयर द्वारा डाली गयी है। यह एक अत्यंत गंभीर मामला है। मार्क स्पेंसर ने यह भी कहा है कि यह काम किसी बहुत चालाक हैकर द्वारा किया गया है। यह कम्प्यूटर एनआईए के पास था और वहां इस कम्प्यूटर में कैसे यह चि_िïयां डाली गयी, जांच तलब है। 

पुलिस का कार्य जांच करके सबूतों का ढंग से आकलन करना और नतीजा अदालतों के सामने पेश करना है। साक्ष्य गढऩा या पैडिंग पुलिस का कार्य नहीं है। एनआईए देश की सबसे मजबूत तफ्तीशी संस्था है और यदि उस पर अविश्वास पैदा हुआ तो यह बहुत दुर्भाग्य की बात होगी। केन्द्रीय गृह विभाग के अधिकारियों का कर्तव्य है कि इस मामले की जांच निष्पक्ष ढंग से करायें ताकि पुलिस द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य पर लोगों को विश्वास रहे और अदालतों को भी ऐतबार कायम रहे। बहरहाल एनआईए जांच कर रही है और उम्मीद है सच सामने आयेगा।

महिला सहकर्मियों के साथ इज्जत का बर्ताव हो


प्रोफेसर मंजूर अहमद 
(सेवानिवृत आईपीएस) 

पूर्व कुलपति, डॉ. भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय, आगरा

प्रिया रमानी और एम जे अकबर के मामले में अदालत ने एक अहम फैसला किया है, जो अनुकरणीय है। प्रिया रमानी, भाजपा नेता एम.जे. अकबर के दफ्तर में काम कर रही थी। उस समय एम.जे. अकबर ने कई बार उनसे दस्त दराजी की और प्रिया रमानी ने इसकी शिकायत भी की। एम.जे. अकबर दुर्भाग्य वश उस मामले में बच निकले और फिर उन्होंने प्रिया रमानी पर मानहानि का मुकदमा किया। इसमें अदालत ने प्रिया रमानी के पक्ष में फैसला किया और कहा कि कोई भी स्त्री अकारण ऐसा इल्जाम नहीं लगा सकती और इस मामले में प्रिया रमानी निर्दोष हैं। 

इससे पहले एक आईपीएस आफिसर के.पी.एस. गिल ने एक भोज के उपरांत एक वरिष्ठï आइएएस आफिसर मिस  रूपन देओल बजाज के पीछे हाथ मारा। यह नितांत आपत्तिजनक कार्य था और दर्जनों अधिकारियों के सामने यह किया गया। केपीएस गिल ने पंजाब में सिख उग्रवाद को समाप्त करने का श्रेय ले रहे थे और लोगों ने इसी कारण उनके इस नितांत गंदे काम को नजरंदाज करने की कोशिश की, परन्तु मिस बजाज लड़ती रहीं और आखिर में सांकेतिक जीत उन्हीं की हुई।

 हमारे देश में २०वीं शताब्दी के उत्तराद्र्घ में लड़कियां अफिस में काम करने लगी। अब एक अच्छी खासी संख्या आफिस में काम कर रही हैं और उनके सम्मान की रक्षा करना सबका फर्ज है। अब भी जो मामले सामने आते हैं, वह बहुत थोड़े से मामले सामने आते हैं, जबकि इस तरह का कृत्य बड़ी संख्या में होता है। स्त्रियां बदनामी या अन्य कारणों से चुप रह जाती है, परन्तु प्रवुद्घ वर्ग को जिन्हें समाज की चिन्ता है और जो लैंगिक समानता की बात करते हैं, उनको चुप नहीं रहना चाहिये। एम. जे. अकबर जैसे आदमी से यह उम्मीद नहीं की जाती थी कि वह ऐसा करेंगे। कई मामले और भी ऐसे आये। एक मामला एक संपादक का भी था, जो अदालत गया। जबसे मी-२ वाला अभियान चला है, तो औरतें व लड़कियां सामने आने लगी हैं। हमें उनकी हिम्मत बढ़ानी चाहिये और उन्हें पूरा संरक्षण देना चाहिये।

सुप्रीम कोर्ट के एक चीफ जस्टिस के विरूद्घ भी एक ऐसी शिकायत आयी थी, परन्तु उस मामले की लीपापोती हो गई और अभी पिछले दिनों संसद में एक सदस्य ने इस मामले को दबाने पर सवाल उठाया था। अक्सर यह प्रश्न पूछा जाता है कि महिला ने यह शिकायत पहले क्यों नहीं लगाया। न्यायालय ने प्रिया रमानी के मामले में बहुत सही कहा है कि यह मामला उठाने में कोई समय की सीमा नहीं है और यह कभी भी उठाया जा सकता है और उसे उठाने के लिए पीडि़त महिला आजाद है। घरों में काम करने वाली औरतों को भी सेक्सुअल हरेसमेंट बहुत ही आम बात हो गयी है। बचाया जाना चाहिये। 

Saturday, February 20, 2021

अमेरिका द्वारा पोषित ब्लैक वाटर जैसे आतंक के ठेकेदार

प्रोफेसर मंजूर अहमद (सेवानिवृत आईपीएस) 

पूर्व कुलपति, डॉ. भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय, आगरा

यह आश्चर्य की बात नहीं होगी कि अमेरिका ने दुनिया भर के भाड़े के लड़ाकुओं को अपने राजनैतिक उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल किया। मालुम हुआ है कि मध्य-पूर्व के देशों में अमेरिकी सेना की तादाद से अधिक ये भाड़े के टटïï्टू है, जो अमेरिकी ठेकेदारों द्वारा युद्घ में उतारे गये हैं। एक अजीब बात और भी है कि अमेरिका राष्टï्र संघ में जिन सरकारों को मान्य शासन घोषित करता है, उन्हीं के विरूद्घ इन आतंकी भाड़े के लड़ाकुओं को भेजता है। ऐसा ही उसने लीबिया में भी किया, जहां ट्रिपोली में स्थित राष्टï्र संघ द्वारा शासन को मान्यता दी गई और उसी शासन के विरूद्घ एक पूर्वी लीबिया के विद्रोही लड़ाका खलीफा की मदद में अमेरिका ने अपने भाड़े के सिपाहियों को उतारा। अब यह बात दस्तावेजों से साबित हो गयी है। अमेरिकी मदद से यह लड़ाके राष्टï्र संघ के द्वारा मान्य सरकार के मुख्यालय पर कब्जा ही करने वाले थे कि तुर्की जैसे कुछ देशों की मदद से इन्हें रोका जा सका। चाहे यमन हो, ईराक हो, लीबिया, सोमालिया हो, हर जगह अमेरिकी भाड़े के लड़ाके भेजे जाते हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार इनकी संख्या मध्य-पूर्व में तैनात अमेरिकी फौजों से कई गुना ज्यादे हैं और उसके मुख्य ठेकेदार एरिक प्रिंस है, जो दुनिया भर में बदनाम ब्लैक वाटर फर्म का मुखिया है। डोनाल्ड ट्रम्प ने चलते-चलते इसको पार्डन प्रदान कर दिया था। बहुत से बदमाशों को चलते हुए डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने कुकृत्यों से माफ कर दिया था, ताकि बाद में उन पर मुकदमा न चलाया जा सके। डोनाल्ड ट्रम्प ने अंतिम दिनों में खुद को भी पार्डन प्रदान करने वाले थे, परन्तु वकीलों की राय से उन्हें रूकना पड़ा।

आखिर इससे ट्रम्प का लक्ष्य क्या था। डोनाल्ड ट्रम्प की ख्वाईश लीबिया, यमन, सोमालिया आदि देशों में स्थिरता नहीं आने देने की थी। मुअम्मर गद्दाफी का लीबिया संसार का सबसे अधिक जन कल्याणकारी राज्य था, जहां स्वास्थ्य, शिक्षा आदि पर नागरिकों को दिये जाने वाली सहायता असीमित थी। चूंकि मुअम्मर गद्दाफी अमेरिकी और पश्चिमी नीतियों के विरोधी थे, अत: उन्हें गिरफ्तार किये जाने के बजाय मार दिया गया। यह काम ब्लैक वाटर के आतंकियों ने किया। एक अंदाजे के अनुसार बताया गया है कि इन ठेकेदारों की आमदनी साल में २०० बिलियन डालर से अधिक है। इस काम में मिस्र और सऊदी अरब भी डोनाल्ड ट्रम्प के साथ थे, क्योंकि इनका भी लक्ष्य यही था कि उत्तरी अफ्रीका में अशांति बनी रहे और मिस्र पूर्वी लीबिया को अपने प्रभाव में रखना चाहता था। अब यह बातें छन छनाकर आ रही हैं। राष्टï्रपति बाइडेन ने कहा है कि अब इन युद्घ के ठेकेदारों के दिन लद गये।

 आज से करीब ७५ साल पहले अमेरिकी राष्ट्रपति वुड्रो विल्सन ने नारा दिया था कि जो भी काम हो, वह खुले तौर पर किया जाये, उनके शब्द थे, Open Covenant, Openly Arrived At, परंतु यूरोप के उपनिवेशी ताकतों को यह कबूल नहीं था और वुड्रो विल्सन मायूस होकर पेरिस से अमेरिका लौट गये। बहुत दिनों  से दुनिया को विश्वास था कि अमेरिकी राष्टï्रपति चाहे इंसाफ पर न हो, परन्तु हमेशा सच बोलता है (US President may not be fair, but it always truthful). इस कसौटी पर आखिरी खरे प्रेसीडेंट आइजन हावर थे, जिन्होंने हमेशा सच कहा और जिससे ब्रिटेन, फ्रांस उनसे हमेशा नाराज रहे। इस कसौटी पर सबसे खराब राष्टï्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और जार्ज डब्लू बुश रहे हैं। राष्टï्रपति बाइडेन दोबारा अमेरिका की पुरानी साख बहाल करना चाहते हैं, यह उनके लिए बहुत जोखिम भरा कार्य है। 

Friday, February 19, 2021

समाज को जीवन और प्रेम का आदर करना चाहिये


प्रोफेसर मंजूर अहमद (सेवानिवृत आईपीएस) 
पूर्व कुलपति, डॉ. भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय, आगरा

 हमारा समाज हिंसक हो रहा है और अब हम केवल अहिंसा परमो धर्म: का नारा लगाने वाले रह गये हैं, सच्चाई यह है कि हम अहिंसा का रास्ता छोड़ चुके हैं और सबसे ज्यादा तकलीफदेह बात परिवार में हिंसा और व्याभिचार की है। आजाद भारत में पहली बार एक स्त्री को फांसी की सजा दी जाने वाली है। वह शबनम नाम की स्त्री, जिसने अपने प्रेमी के साथ मिलकर पूरे परिवार की हत्या की और अपने छोटे से भतीजे को भी नहीं बख्शा। यह वीभत्स हत्याकांड था और इससे यह मालुम होता है कि परिवार के रिश्ते कितने कमजोर हो गये हैं। यदि इस स्त्री को अपने परिवार से इतनी ही दुश्मनी हो तो उसे अलग होने में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिये।  उसी तरह और बहुत से मामलों में प्रेम संबंध के कारण हत्याएं हुई हैं और हो रही हैं। परिवार के बीच कुछ वर्जनाओं के कारण अविश्वास का भाव तेजी से पनपा है। इन कारणों का सामाजिक विश्लेषण बहुत जरूरी है। 

पहली बात तो यह है कि शादी और तलाक दोनों पर हमारी धारणाएं बदलनी चाहिये। युवाओं का अपनी मर्जी से शादी करना उनका हक है। हमने हर जगह इस पर पहरे बिठा रखे हैं। इस दौर में जब सूचना प्रौद्योगिकी इतनी बढ़ चुकी है तो हमारे पुराने सामाजिक मान्यताएं काम नहीं आने वाली। यदि हमने उनका पुनरीक्षण नहीं किया और अपने सामाजिक मूल्यों में कोई तब्दीली नहीं की तो यह बीमारी बहुत फैलने वाली है। वह स्त्री जिसकी फांसी होने वाली है, उसे अपने मनपसंद साथी चुनने में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिये थी। उसके द्वारा की गयीं जघन्य हत्याएं परिवार और पे्रम के बीच तालमेल के की खाई को दर्शातें हैं। पश्चिमी देशों में जहां सूचना प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल लोग खूब करते हैं, वहां शादी और तलाक नितांत व्यक्तिगत मामले हैं, उन पर ज्यादा बहस नहीं होती। अमेरिकी राष्टï्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की कई शादियां थी और यही हाल फ्रांस के राष्टï्रपति इनैमुएल मैक्रां का भी है, लेकिन इसको लेकर कहीं कोई हंगामा नहीं है। मौजूदा दौर में यह सही भी है। यदि जीना मुश्किल हो तो जान लेने की जगह अलग होने का विकल्प हमेशा होना चाहिये। युवाओं और युवतियों में भी कभी जाति, कभी खाप के बंधन आगे आते रहते हैं। यदि लड़के और लड़कियां साथ पढ़ेंगे तो एक-दूसरे के प्रति आकर्षित होने से उन्हें कोई रोक नहीं सकता। यदि वे इसको शादी में बदलना चाहते हैं तो भी इसमें कोई रोक नहीं होनी चाहिये। महात्मा गांधी के परिवार के एक व्यक्ति ने उनके सामाजिक मूल्यों के विरूद्घ कहीं शादी करना चाहते थे। गांधी जी ने केवल यह कहा कि यह शादी तीन साल तक इंतजार करने के बाद करें। गांधी जी का ख्याल होगा कि यदि यह क्षणिक प्यार का मामला होगा तो तीन साल में खत्म हो जायेगा और यदि युवक व युवती तीन साल तक इंतजार करते हैं तो अवश्य ही मजबूत बंधन है। इस तरह का रूख समाज में होना चाहिये। इससे परिवार में आत्महत्या और हत्या की समस्या कम होगी। 

हमारी फिल्मों ने दो तरह से समस्याएं पैदा की है। एक तो वह बहुत ही हिंसक दृश्य दिखाते हैं और हमारी फिल्मों को देखने के बाद ऐसा लगता है कि हमारे समाज में कानून, पुलिस, अदालतों की कोई भूमिका नहीं है और हीरो अपना इंसाफ खुद ही बदला लेकर करता है। हमारा हीरो मारपीट में यकीन करता है और उसके इस कृत्य को लोग पसंद करते हैं। जाहिर है कि इससे समाज में हिंसा और बदला लेने की भावना बढ़ती है। दूसरा फिल्मों के द्वारा अश्लील दृश्य दिखाकर लड़के और लड़कियों की कामभावनाओं को बढ़ाते हैं। यही नहीं ऐसे दृश्य उन फिल्मों में भी होते हैं, जो परिवार के साथ बैठकर देखने के लिए बनती हैं। हमारे सेंसर बोर्ड को इस तरफ ध्यान देना चाहिये और सरकार को भी ऐसी फिल्मों को बढ़ावा देना चाहिये, जिनका आधार  सामाजिक मूल्य, शांति और प्रेम हो।

हमारे समाज में जीवन के प्रति इज्जत कम होती जा रही है। देखते हैं कि फिल्मों में लोग ऐसे मारे जाते हैं, जैसे कोई मच्छर मार रहा हो। जीवन की रक्षा एकबहुत अहम सामाजिक मूल्य है और इस पर भी फिल्म, शिक्षण संस्थाएं और परिवार तीनों की जिम्मेदारी है कि बच्चों में जीवन मात्र के लिए प्रतिबद्घता को जागृत करें।

Thursday, February 18, 2021

भारी पड़ने लगा है पर्यावरण को नजरंदाज करना


प्रोफेसर मंजूर अहमद (सेवानिवृत आईपीएस) 

पूर्व कुलपति, डॉ. भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय, आगरा

जिस तरह से हम लोगों ने पर्यावरण को नजरंदाज किया है और  ग्लोबल वार्मिंग को अपनी भौतिक जरूरतों को पूरा करने के लिए अंधाधुंध ऊर्जा के इस्तेमाल से बढऩे दिया है, उसका नतीजा कई तरह से हमारे सामने आ रहा है। अभी तीन दिन पहले अमेरिका के उत्तरी हिस्से में करोड़ों लोग ठंडक से ठिठुर रहे हैं। उसमें 24 लोगों की मृत्यु भी हो गई है। तमाम शहरों में बिजली कटी हुई और करीब 10 करोड़ अमेरिकी ठंड से परेशान हैं। आने वाले दिनों में यह हालत और खराब होगी, विशेषकर टेक्सास, आर्कन्सास और लोवर मिसीसिपी में हालत बहुत खराब है। सरकार की तरफ से लोगों से कहा गया है कि वे घर से बाहर नहीं निकले और अपने को ठंड से बचाये। ठंड माइनस 22 डिग्री तक पहुंच गई है और बिजली न होने से घरों में गर्म करने का सभी उपाय काम नहीं कर रहे हैं। लोग लकड़ी आदि के जरिये घरों को गर्म करने की कोशिश कर रहे हैं, परन्तु यह काफी नहीं है। कई जगह कार्बन मोनोआक्साइड के कारण भी मृत्यु हुई हैं। 

वैज्ञानिकों ने बताया है कि यह ग्लोबल वार्मिंग की वजह से हुआ है और बहुत हद तक मनुष्य ही इसका जिम्मेदार है। ग्लोबल वार्मिंग के कारण जो आर्कटिक की ठंडी हवाएं बिना रोक-टोक के आ जाती हैं और उनके कारण पूरा इलाका ठंड में डूब जाता है। इसे आर्कटिक वोरटेक्स या पोलर वोरटेक्स भी कहते हैं। यह तूफान पहले पोल के आस-पास ही सीमित रहता था, अब दक्षिण में काफी दूर तक इसका असर हो रहा है। इस तूफान से बचने का एक ही उपाय है कि इंसान ग्लोबल वार्मिंग को कम करें, ताकि आर्कटिक क्षेत्र में ग्लेशियर न टूटे और तूफान दक्षिण में नहीं आयें। यह इलाके जो इस ठंड की आंधी की जद में हैं, घनी आबादी वाले हैं और इसका असर ऐसा ही होगा, जैसा कोरोना के दौरान लॉकडाउन में हुआ था। हफ्तों आर्थिक कार्यक्रम ठप हो जायेंगे। जनजीवन पटरी से उतर जायेगा।

Wednesday, February 17, 2021

फ्रेंच समाज में मुस्लिम विरोध

प्रोफेसर मंजूर अहमद

(सेवानिवृत आईपीएस) पूर्व कुलपति, डॉ. भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय, आगरा

यूरोप में सबसे अधिक मुस्लिम आबादी फ्रांस में ही है। यह मुसलमान फ्रांस के उत्तरी अफ्रीका स्थित उपनिवेशों से आये हैं और हर जगह उनकी उपस्थिति है। वह मंत्री भी रहे हैं और संसद में भी अच्छी खासी संख्या में सदस्य बने हैं। फ्रांस में द्वितीय विश्व युद्घ के पहले तक नस्लवाद ब्रिटेन के मुकाबले में बहुत कम था और इस बात पर फ्रांस के लोग गर्व किया करते थे। मोरक्को, अल्जीरिया जैसे देशों के लोग फ्रांस में बड़ी तादात में नागरिक बने। फ्रांस ने अपनी नागरिकता में कोई फर्क  नहीं किया था और सभी के साथ समान रूप से बर्ताव होता था। इतना अवश्य है कि कुछ ऐसी रस्में जो फ्रेंच कल्चर के लिए अस्वीकार्य हैं, उनसे मुसलमानों को रोका जाता था। मिसाल के तौर पर एक से अधिक पत्नी रखने की रस्म फ्रांस में हमेशा अस्वीकार्य रहा। परन्तु फ्रांस के शहरी इलाकों में स्त्रियों की आजादी के नाम पर  व्याभिचार और बिना शादी के साथ रहना आम बात थी। राजनीतिक नेता भी इसके शिकार होते थे और यह बुरा नहीं माना जाता था। मुसलमानों में यह हमेशा अस्वीकार्य रहा। स्त्रियों के कौमार्य (वर्जिनटी) का फ्रांस के शहरी इलाकों में महत्व नहीं था, हालांकि शहर के बाहर के इलाकों में इसाईयों और मुसलमान दोनों समुदायों में इस पर जोर दिया जाता था। मुसलमानों को फ्रांस में कोई खास परेशानी नहीं थी और उनके रेस्त्रां और बूचरीज भी अलग हुआ करते थे। आज से करीब १५ साल पहले फ्रांस में इस बात पर जोर दिया गया कि होटलों के आगे धार्मिक नाम लिखना फ्रेंच कल्चर के विरूद्घ है और सरकार ने भी इसे बन्द कराने की कोशिश की। शायद इसका कारण यह भी था कि उत्तरी अफ्रीका के मुसलमानों के रेस्त्रां में उनके स्वाद के लिए बहुत फ्रेंच जाया करते थे और उससे फ्रांस के शेख नागरिकों का बिजनेस प्रभावित होता था। आज से करीब ४० साल पहले जब मैं पेरिस रूका था तो वहां मुसलमानों को कोई परेशानी नहीं थी, केवल कुछ पढ़े लिखे लोग यह शिकायत जरूर करते थे कि राजनीति में संख्या में अधिक होने के बावजूद उनका प्रतिनिधित्व यहूदियों से कम है। 

दो कारणों से इस रिश्ते में खटास आयी। पहला कारण तो उत्तरी अफ्रीका के देशों में नयी शिक्षा से लैस नौजवानों ने फ्रांस द्वारा उनके संसाधनों के शोषण पर आवाज उठाना शुरू किया। यह सच्चाई है कि उत्तरी अफ्रीका के साथ फ्रांस का व्यापार केवल फ्रांस के फायदे में होता है। दूसरी बात जो ज्यादा अहम है, वह फ्रांस के अन्दर इस्लामिक भावना का पुनरूत्थान है। सारी दुनिया में इस्लामोफोबिया के प्रतिक्रिया के रूप में जो मुसलमानों में सांस्कृतिक पुनरूत्थान की भावना पैदा हुई, उससे फ्रांसीसी समाज में मुसलमानों के बारे में खराब प्रतिक्रिया हुई। पिछले एक दशक से जिस तरह फ्रांस और बेल्जियम में कुछ गैर जिम्मेदार लोगों ने कठमुल्लों के प्रभाव से हिंसा का रास्ता अपनाया, उसे भी समाज में बंटवारा हो गया। 

पिछली बार पैगम्बर साहब के कार्टूनों के बाद जो मुसलमानों की प्रतिक्रिया थी, वह सहज थी और यदि ऐसा ईसा मसीह का कार्टून बनता तब भी यही प्रतिक्रिया होती। परन्तु उसके बाद राष्टï्रपति मैक्रां द्वारा उठाया गया कदम फ्रेंच परम्पराओं के विरूद्घ थे। राष्टï्रपति मैक्रां ने उन कार्टूनों का सरकारी मार्गों पर लगाने दिया, जो अनुचित था। फ्रांस में विशेषकर पेरिस में बहुत सी मस्जिदें हैं और एक में मराकस के लोगों के द्वारा बनायी गयी लकड़ी की मस्जिद बहुत सुन्दर है और दुनिया भर के लोग इसे देखने आते हैं। कोई व्यक्ति मस्जिद में जा सकता है और उसका कोई रिकार्ड नहीं रखा जाता। हो सकता है कि कुछ आतंकवादी मस्जिद में गये हों, इसलिए मस्जिदों में पहरा बैठाना सही नहीं है। फ्रांस में खूफिया खबरें जमा करने की जितनी सहूलियत है, उससे बिना शोर शराबे के फ्रेंच सरकार लोगों पर नजर रख सकती है, लेकिन इसके लिए कानून बनाना मुनासिब नहीं था। जहां तक वर्जिनटी टेस्ट की बात है, इसका इस्लाम से कोई संबंध नहीं है और यह केवल उत्तरी अफ्रीका के मुस्लिम कल्चर का हिस्सा है। बहुविवाह पर पाबंदी एक तरह से फ्रांस में बहुत दिनों से है। यह अवश्य है कि कानूनी दायरें मुसलमानों को लेने से फ्रांसीसी समाज उसी रास्ते पर जा रहा है, जिस रास्ते पर कई और देश जा रहे है। लीपेन बहुत पहले फ्रांस में इस भेदभाव की बुनियाद डाली थी और अब यह पौधा बड़ा हो गया है। बेहतर यह होता कि फ्रांस, जर्मनी की तरह से मुसलमानों से बराबरी का बर्ताव करता। बदले हुए फ्रांस से अफ्रीकन देशों से उसके व्यापार पर भी देर या सबेर खराब प्रभाव पड़ेगा। इसका फायदा तुर्की को मिलेगा।

Sunday, July 5, 2020

कभी मत भूलना माँ बाप को अपनी जवानी मे

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कभी मत भूलना माँ बाप को अपनी जवानी मे
रहें जिन्दा सदा एहसान उनके, जिंदगानी मे I
हजारों कोशिसों के बाद जीवन कि डगर पर हम,
बिना उनकी कृपा के एक पल भी चल नहीं सकते I
चलाया था लकड़पन मे उँगलियाँ थाम कर जिसने,
बुढ़ापे मे सहारा हम भला क्यों बना नही सकते I
हजारों जिद किया करते थे जिनसे अपने बचपन मे,
लगादी सारी उसने जिंदगानी पूरा करने में I
क्या उनकी एक भी ख्वाहिश हमें लगने लगी मुश्किल,
बिछा दी सारी जिसने नौजवानी मेरी मंजिल में I
बड़े खुद गरज हो साहब जहाँ सब घूम आते हो,
समझ कर चाँद को ऊँचा उसे भी चूम आते हो I
समंदर लाँघ कर गहराइयाँ भी नाप लाते हो,
अगर मुमकिन हुआ तो हर जहाँ अपना बनाते हो I
मगर माँ बाप के चरणो की क्या गहराइयाँ देखी,
तुम्हारी आस मे वेबस नजर की तनहाईयाँ देखी,
वो सूखे आंख के आंशू, कि जैसे कह रहें हों कुछ,
फटे जूतों के अंदर दरकती विवाइयाँ देखी I
नही अब याद तुमको चाँद तारों की कहानी है,
सुनाती रात भर जो माँ वो अब लगती विरानी है I
कभी धोखे से अपने लाल का न दिल दुखाती थी,
रहें लल्ला सलामत, फिक्र मे इस डूब जाती थी I
बुरे सपने न आये रात मे, बस इस लिए ही तो,
बिछौना के सिरहने पर, सदा चाक़ू छिपाती थी I
अगर धोखे से भी बस एक आंशू आंख से गिरता,
गिरा सैलाब हो जैसे, मोहल्ले को बताती थी I
अरे नादान, ममता की कोई कीमत नही होती,
कभी मत नापना गहराइयाँ सीमित नही होती I

..............................रामसनेही " सजल "

Tuesday, November 19, 2019

अयोध्या मामले पर मुस्लिम लॉ बोर्ड की प्रतिक्रिया (सम्पादकीय)

प्रो. मंज़ूर अहमद (प्रधान संपादक)

बीते 9 नवम्बर को राम जन्मभूमि और मस्जिद के बारे में उच्चतम न्यायालय की पांच जजों की संविधान पीठ से फैसला आने के बाद लोगों ने राहत की सांस ली थी। बहुत वर्षों से समाज के दो समुदायों में जारी एक विवाद का अंत होते लोग देख रहे थे। दोनों तरफ के पक्षकारों ने फैसले के बाद नफा-नुकसान पर ध्यान न देते हुए सामाजिक भाईचारे को तरजीह देते हुए मामले का समाधान के लिए सहयोग देने की बात कही।
उच्चतम न्यायालय ने अपने फैसले में विवादित जमीन को रामलला विराजमान तथा मस्जिद के लिए अलग से पांच एकड़ जमीन यूपी सुन्नी सेन्ट्रल वक्फ बोर्ड को देने की बात कही है। आम मुसलमानों में मस्जिद के लिए जमीन लेने का स्वागत नहीं है। उनका विचार है कि यदि अयोध्या में नई मस्जिद बनाने की आवश्यकता हो तो जमीन खरीदकर ऐसा किया जा सकता है। अब आल इंडियन मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने कल की बैठक में इस फैसले पर रिव्यू पिटीशन दाखिल करने का निर्णय लिया है। कानून के जानकार बोर्ड के इस निर्णय से हैरान है। दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस सुहैल सिदï्दीकी ने सही कहा है कि इस तरह के कार्यों से न्यायालय के फैसले को कार्यरूप देने में सिवाय देरी होने को और कुछ नहीं हासिल होने वाला है। सही बात तो यह है कि न्यायालय का यह फैसला पांच जजों की संविधान पीठ ने दिया है। यह भी सही है कि फैसले को सर्वसम्मति से दिया गया। यदि इसमें बहुमत का फैसला होता तो रिव्यू पिटीशन के लिए मौके होते, परन्तु अब इससे कोई फायदा निकलना मुमकिन नहीं लगता। इसे तो केवल दो पक्षों में झगड़ों को पुन: तूल देने के रूप में देखा जा सकता है।
जैसा कि हमने फैसले के तुरन्त बाद लिखा था कि मुसलमानोंं ने अपना मुकदमा ठीक से लड़ा और जो कुछ उनके बस में था, उन्होंने किया। कुरान में भी कहा गया है कि अल्लाह किसी पर उसकी क्षमता से बड़ा बोझ नहीं डालता, जितना वह उठा नहीं सके। मुसलमानों ने अपनी मस्जिद बचाने के लिए अपने शक्ति भर प्रयास किया और इससे ज्यादा कुछ नहीं कर सकते थे। असल समस्या राजनीति में उनके संदर्भित रहने की है और वह प्रयास जारी रहना चाहिये तथा वह अपनी आर्थिक और सामाजिक स्थिति को मजबूत करने का प्रयास करते रहें। मुसलमानों को राजनीतिक भटकाव में नहीं पडऩा चाहिये, क्योंकि इससे उनको हासिल तो कुछ नहीं होता, बस राजनीतिक फायदे के लिए उनका इस्तेमाल ही होता है।
1986 में शाहबानों मुकदमें के फैसले के बाद अयोध्या का मामला बड़े रूप में सामने आया। उसके पहले आम लोगों को मालूम भी नहीं था कि अयोध्या में कोई मस्जिद का झगड़ा है। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के मामा एवं सलाहकार अरूण नेहरू ने ताला खुलवाकर इस मामले को अपने पक्ष में इस्तेमाल करने का प्रयास किया और उसके बदले में शाहबानो मुकदमें में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बदलते हुए नया कानून लाने का काम किया। बहुत लोगो का विचार था कि यह कार्य आपस में संबंधित थे। मुसलमानों के पक्ष को शंका थी कि कुछ मुस्लिम धार्मिक नेताओं ने नान नफ्का देने से बचने के लिए सिजदागाह का सौदा किया। इस कार्य में उन्हें यह लगा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के कुछ लोग भी शामिल थे। शाहबानों मुकदमें में सुप्रीम कोर्ट ने असल मामले से हटकर मुसलमानों के कानून के बारे में जो कुछ अनावश्यक टिप्पणियां (Obiter Dicta)  की थी, उससे मुस्लिम समाज में एक भावनात्मक प्रतिक्रिया हुई थी और लोगों का ध्यान मूल मुद्दे से हट गया था। अब भी कुछ लोग पर्सनल लॉ बोर्ड की भूमिका से सशंकित है।

Monday, November 18, 2019

पूर्वोत्तर में नागा नेतृत्व और केन्द्र के बीच तनाव (सम्पादकीय)

प्रो. मंज़ूर अहमद 
2015 में भारत सरकार ने नागा नेताओं से एक समझौता किया था और समझौते के बुनियादी (FRAMEWORK AGREEMENT) ढांचा पर सहमति हुई थी। इस समझौते की बुनियादी ढांचे पर भी बातचीत होनी थी। यह बातचीत किन विन्दुओं पर होनी थी, इसे सरकार ने उजागर नहीं किया था। तब श्री आर.एन. रवि भारत सरकार और नागा नेताओं के बीच समझौते में वार्ताकार थे और अब वह नागालैण्ड के राज्यपाल भी हैं। यह बातचीत 31 अक्टूबर तक पूर्ण हो जानी थी, परन्तु किन्हीं कारणों से प्रधानमंत्री की सलाह पर यह तिथि आगे बढ़ा दी गई है।
नागा नेताओं की मांग है कि उनके प्रस्तावित नागालिम अर्थात नागालैण्ड गणराज्य में पड़ोसी राज्यों के उन हिस्सों को भी शामिल किया जाये, जहां नागा आबादी रहती है विशेषकर मणिपुर राज्य के एक नागा बहूल हिस्से को शामिल करने की मांग है।
बातचीत के बुनयिादी ढांचे में कुछ शब्द ऐसे थे, जिनसे भ्रम उत्पन्न होना अवश्यंभावी था। एक शब्द साझा सम्प्रभुता (SHARED SOVEREIGNTY) और दूसरा शब्द नागालैण्ड के लिए एक मिनी संसद बनाये जाने की थी। साथ ही एक अलग से संविधान और झण्डे की बात भी की गई थी। अब यही मांगे बातचीत में रोड़ा उत्पन्न कर रही हैं।
नागालैण्ड का विद्रोह कोई नया नहीं है। 1888 में जब अंग्रेजों ने देश के इस हिस्से पर अपना आधिपत्य जमाया था, उस समय से ही नागा अपने को आजाद करने का प्रयास करते रहे हैं। साइमन कमीशन जब भारत आया था, तब भी नागाओं ने अपने को भारत संघ से अलग रखने की मांग की थी। नागा नेता फीजो के नेतृत्व में उनका भारत सरकार के विरूद्घ विद्रोह चलता रहा था। 1947 में नागा नेताओं ने भारत की आजादी से एक दिन पहले अपनी आजादी की घोषणा की थी।
जम्मू और कश्मीर में धारा 370 हटने के बाद नागा नेताओं में केन्द्रीय सरकार के प्रति शंका पैदा हुई है। एक नागा नेता ने यह बयान भी दिया है कि सरकार नागालैण्ड को कश्मीर न समझे। नागा नेताओं के पास उनकी अपनी फौज है और दशकों तक भारतीय सेना से लडऩे का तजुर्बा भी है। ऐसी हालत में राज्यपाल आर.एन. रवि का यह कहना कि नागालैण्ड के मामले में केन्द्र सरकार सख्ती से अपना फैसला लागू करेगी, एक नये विद्रोह का आरम्भ विन्दु हो सकता है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राजनीतिक सूझबूझ का परिचय देते हुए बातचीत की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की बात कही है। उनका यह निर्णय पूर्वोत्तर में हमारे हित में है।

Tuesday, March 5, 2019

राहत की खबर

दो दिन पहले दक्षिण कोरिया और अमेरिका के वार्षिक संयुक्त युद्धाभ्यास को बंद करने की घोषणा को मौजूदा विश्व की स्थिति के मद्देनजर एक अहम घटनाक्रम के रूप में देखा जा सकता है। यह सही है कि किसी एक छोटी घटना या मामले की वजह से शांति या फिर किसी भी यथास्थिति में अक्सर तेजी से बदलाव आता दिखता है और कई बार सब कुछ ठीक होने के बाद उस पर पानी फिर जाता है। मगर दक्षिण कोरिया और अमेरिका के ताजा फैसले की पृष्ठभूमि में चूंकि उत्तर कोरिया के साथ संबंधों और संभावित हालात का भी खयाल है, इसलिए उम्मीद की जानी चाहिए कि समूचे कोरियाई प्रायद्वीप की शांति की दिशा में यह एक अहम पहलकदमी साबित होगी। आमतौर पर साल के इन्हीं महीनों के दौरान किया जाने वाला ‘फोल ईगल’ अभ्यास अमेरिका और दक्षिण कोरिया के बीच होने वाला एक बड़ा संयुक्त सैन्य अभ्यास है। ऐसे मौके पहले भी आए हैं जब उत्तर कोरिया ने इस युद्धाभ्यास को क्षेत्रीय समस्या पैदा करने वाला एक मुख्य कारक बताया है और अपनी स्पष्ट नाराजगी जाहिर की है। बल्कि इस आयोजन को वह घुसपैठ की कोशिश भी बताता रहा है। अब फिलहाल युद्धाभ्यास को स्थगित करने के फैसले के बाद देखना है कि इसे अमेरिका और दक्षिण कोरिया की सेना की तैयारियों को लेकर क्या आकलन सामने आते हैं।
गौरतलब है कि हाल ही में उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग उन और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच हुई बातचीत एक तरह से बेनतीजा रही। उत्तर कोरिया ने साफ तौर पर यह जता दिया कि जब तक उस पर लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों को नहीं हटाया जाता है, तब तक परमाणु हथियारों को कम करने या निरस्त्रीकरण को लेकर उससे बहुत ज्यादा उम्मीद नहीं की जानी चाहिए। हालांकि उत्तर कोरिया का कहना है कि उसने प्रतिबंधों में आंशिक राहत देने की ही मांग की थी। लेकिन अमेरिका का रुख इसके प्रति सकारात्मक नहीं दिख रहा है। जाहिर है कि अगर यही स्थिति बनी रही तो इस क्षेत्र में अमेरिका और दक्षिण कोरिया के बीच सहयोग और खासतौर पर युद्धाभ्यास के मसले पर उत्तर कोरिया की प्रतिक्रिया का अंदाजा लगाया जा सकता है। यह प्रतिक्रिया प्रत्यक्ष और सैन्य न भी हो तो शायद शांति की स्थितियों के लिए सकारात्मक नहीं होगी।
इसलिए अगर युद्धाभ्यास की प्रक्रिया को कुछ समय के लिए टाला जाता है तो इसे तनाव बढ़ने की चिंता से निपटने की कोशिश के तौर पर देखा जाएगा। इससे दोनों पक्षों के बीच सैन्य कार्रवाई की तीव्रता को कम करने में मदद मिलेगी। दरअसल, पिछले कुछ समय से उत्तर कोरिया और दक्षिण कोरिया अपने मसलों को हल करने के लिए एक सहज हालात बनाने की कोशिश में हैं। ऐसे में दक्षिण कोरिया को भी इस बात का एहसास होगा कि युद्ध और तनाव के माहौल में किस ओर बढ़ा जा सकेगा। शायद इसी पृष्ठभूमि में अमेरिका और दक्षिण कोरिया के बीच इस बात पर सहमति बनी कि फिलहाल वार्षिक संयुक्त युद्धाभ्यास को रोक दिया जाए, ताकि शांति की ओर बढ़ते कोरियाई प्रायद्वीप में तनाव या टकराव की किसी नई स्थिति से बचा जा सके। बल्कि कहा जा सकता है कि इस पहलकदमी का एक मुख्य मकसद उत्तर कोरिया से जुड़े संकट को खत्म करने की कोशिश है, जो इसे आक्रमण की मंशा से किए जा रहे अभ्यासों के तौर पर देखता है। यों भी, किसी भी युद्ध के नतीजे का अंदाजा लगाना कोई बहुत मुश्किल काम नहीं होता। इसलिए युद्ध की स्थिति पैदा होने से पहले ही अगर उसे खत्म करने की कोशिश होती है तो यह एक शांतिपूर्ण विश्व के हित में होगी।

Monday, March 4, 2019

सोशल मीडिया का बढ़ता दुरुपयोग

   पिछले पांच सालों में एक बात जो बड़ी तेजी से बदली है, वह सोशल मीडिया तक आम लोगों की पहुंच। पहले लोग इससे परहेज किया करते थे। हमारे पूर्ववर्ती पीढ़ी की सोच थी कि सोशल मीडिया पर पोर्न जैसी हानिकारक सामग्रियों को देखकर बच्चे भटक सकते हैं। परन्तु अब वह बच्चे बड़े हो गये हैं और बंदिशों में जीने वाले बच्चे अब स्वच्छंद हैं, साथ ही मोबाइल फोन पर सोशल मीडिया की दस्तक और सस्ते व तेज डेटा स्पीड ने इस नई विधा को बहुत तेजी हर घर क्या हर हाथ में पहुंचा दिया है। इसके दुरूपयोग भी सामने आने लगे हैं। भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव के बीच में सोशल मीडिया की गतिविधियां बहुत ही नकारात्मक देखने को मिली हैं। ऐसे में दिल्ली और एनसीआर के कई स्कूलों ने भारत-पाक तनाव के मद्देनजर सोशल मीडिया पर चल रहे नफरत भरे अभियानों के दुष्प्रभावों से बच्चों को बचाने के लिए खास पहल की है। उन्होंने पैरंट्स से कहा है कि वे बच्चों से इस बारे में बात करें। अगर बच्चों के मन में कोई सवाल है तो वे उसका जवाब जरूर दें और उन्हें विस्तार से उस संबंध में जानकारी दें। संभव है बच्चे सोशल मीडिया पर प्रचारित किसी गलत तथ्य को सही मान बैठे हों। अभिभावकों को उन्हें सचाई से अवगत कराना चाहिए। मुमकिन है किसी दुष्प्रचार से किसी बच्चे के भीतर डर बैठ गया हो, हताशा पैदा हो गई हो या किसी समुदाय के प्रति नफरत का भाव भर गया हो। ऐसे में अभिभावक को चाहिए कि वह बच्चे में विवेकपूर्ण दृष्टि पैदा करें। कई स्कूलों में तो शिक्षक भी यह काम कर रहे हैं। कुछ स्कूलों ने तो बच्चों को सोशल मीडिया से दूर रहने को कहा है।
हालांकि यह संभव नहीं है। आज के बच्चे इसी के साथ बड़े हुए हैं। वह इसी के शिल्प में संवाद करते हैं। लेकिन वे इसके खेल को नहीं समझ पाते। उनका कोमल मन झूठ और सच में आसानी से अंतर नहीं कर पाता और वह सोशल मीडिया की किसी कपोलकल्पना को अपनी धारणा बना लेता है। पुलवामा में आतंकी हमला होने के बाद सोशल मीडिया के अलग-अलग प्लैटफॉर्म पर नफरत भरी टिप्पणियां और तस्वीरें आने लगीं। भारत के एयर स्ट्राइक के बाद तो इसकी बाढ़ सी आ गई। न सिर्फ पाकिस्तान बल्कि अपने ही देश के कुछ समुदायों के प्रति जहर उगलने का सिलसिला शुरू हो गया जो अब भी नहीं थमा है।
इस क्रम में न सिर्फ मर्यादा की सीमाएं लांघी गईं बल्कि ऐतिहासिक तथ्यों की भी धज्जियां उड़ाई गई हैं। सरकार के बयानों को भी तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया। कई गड़े मुर्दे उखाड़े गए। राजनेताओं का मजाक उड़ाया गया। उनकी अभद्र तस्वीरें डाली गईं। अगर किसी ने युद्ध के विरोध में कुछ कहा या भारत-पाक दोस्ती की बात की तो उसके खिलाफ गालियों की बौछार शुरू हो गई। ऐसा लगता है कि अनपढ़ और कुंठितों की एक फौज सोशल मीडिया पर कुंडली मारकर बैठ गई है। लेकिन ऐसे लोगों के अलावा सोशल मीडिया पर एक तबका ऐसा भी है जो अपने निहित स्वार्थ के लिए जहर के बीज बो रहा है। दुर्भाग्य से पढ़े-लिखे समझदार लोग भी उनकी बातों में आ जाते हैं। लेकिन नई पीढ़ी को उनसे बचाना होगा।
आज ऐसे नागरिक तैयार करने की जरूरत है जो विवेकवान हों, जिनके पास वैज्ञानिक नजरिया हो और जो तर्क की कसौटी पर हर तथ्य को परखते हों। सोशल मीडिया पर नियंत्रण की कोशिशें कई स्तरों पर चल रही हैं। पर सबसे ज्यादा जरूरी है जागरूकता फैलाने की। इस दृष्टि से दिल्ली और एनसीआर के कुछ स्कूलों की पहल महत्वपूर्ण है। देश के अन्य स्कूलों को इस दिशा में सोचना चाहिए। 

Saturday, February 16, 2019

बुरा पड़ोसी हमेशा दुखदायी साबित होता है

Pulwama Attack Par Opinion
कहते है कि अच्छा पड़ोस न होना सबसे ज्यादा तकलीफदेह साबित होता है। पुलवामा में भारतीय जवानों पर हुए आतंकी हमले के बाद यह बात भारत के संदर्भ में सच साबित हो रही है। अभी सप्ताह भर भी नहीं हुए थे, भारत सरकार द्वारा बजट पेश करते हुए तमाम नई उपलब्धियों का बखान करते हुए अगले १० वर्षों के लिए विकास का खाका खींंचा गया था। तब यह कोई नहीं जानता था कि आने वाले समय में क्या होने वाला है। पुलवामा में आतंकी हमले ने हमारे सपनों को चूर किया है। भारत-चीन के संदर्भ में यह बात पक्के तौर पर कहा जा सकता है कि तमाम उपलब्धियों के बावजूद पड़ोसी का मिजाज किसी के सुकून में ज्यादा मायने रखता है।
जम्मू कश्मीर का नेशनल हाईवे जवानों के लिए 'मौत की सड़क', 2013 से अब तक हुए 11 आतंकी हमले, 58 जवान शहीद
पुलवामा में गुरुवार को हुए अब तक के सबसे बड़े आतंकी हमले ने भारत को तो हिलाया ही है, दुनिया के कई देश भी इस हमले से सकते में हैं। अब यह किसी से छिपा नहीं रह गया है कि इस हमले के पीछे पाकिस्तान है, भले पाकिस्तान सरकार इसका खंडन कर रही हो। पुलवामा के इस हमले की जिम्मेदारी जैश-ए-मोहम्मद ने ली है और जैश का सरगना मौलाना मसूद अजहर पाकिस्तान में ही रहता है। इस आतंकी संगठन का संचालन परदे के पीछे से पाकिस्तान सरकार और आइएसआइ ही करती है। दुनिया के ज्यादातर देश पाकिस्तान को आतंकवादी देश घोषित कर चुके हैं। यह सब जानते-बूझते भी चीन पाकिस्तान के साथ खड़ा है और उसकी आतंकवादी नीतियों और गतिविधियों को खुल कर समर्थन दे रहा है। संकट की इस घड़ी में भारत को एक बड़ा झटका यह लगा है कि चीन ने एक बार फिर मसूद अजहर को संयुक्त राष्ट्र द्वारा अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी घोषित कराने से साफ इंकार कर दिया है। हैरान करने वाली बात यह है कि एक तरफ तो चीन भारत के साथ दोस्ती का दम भरता है और दूसरी ओर भारत के कट्टर दुश्मन मसूद अजहर को वह आतंकवादी मानने को तैयार नहीं है। हालांकि पुलवामा हमले की चीन ने निंदा की है, लेकिन यह उसका ढोंग भर है।
पुलवामा आतंकी हमले से नए आतंकवाद की बू
भले चीन वैश्विक मंचों से कहता रहे कि वह आतंकवाद के खिलाफ और भारत के साथ है, लेकिन हकीकत कुछ और ही है। मसूद अजहर के बचाव में चीन का उतरना कोई नई बात नहीं है। जब-जब सुरक्षा परिषद में मसूद अजहर का मामला गया, परिषद के सदस्य देश भारत के साथ खड़े नजर आए और इस पक्ष में रहे कि मसूद अजहर को अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी घोषित किया जाना चाहिए। लेकिन ऐन वक्त पर चीन ने ऐसे अड़ंगे लगाए कि भारत के प्रयास विफल होते गए। सबसे पहले अप्रैल, 2016 में चीन ने सुरक्षा परिषद की प्रतिबंधित आतंकियों की सूची में मसूद अजहर का नाम डालने की भारत की कोशिश को तकनीकी आधार पर रुकवा दिया था। फिर उसी साल अक्तूबर में मसूद को अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी घोषित करने की भारत की अपील पर बाधा पैदा की। तीसरी बार फरवरी, 2017 में मसूद अजहर पर पाबंदी के अमेरिका के प्रयास को वीटो कर दिया। जाहिर है, उसके ये सारे प्रयास भारत विरोधी हैं।
महमूदाबाद में लगे पाकिस्तान मुर्दाबाद के नारे, देखे वीडियो
भारत लंबे समय से इस कोशिश में लगा है कि मसूद अजहर को अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी घोषित किया जाए ताकि इसके जरिए उस पर शिकंजा कसा जा सके और उसके भारत प्रत्यर्पण के लिए पाकिस्तान पर दबाव बनाया जा सके। मसूद अजहर ने 2001 में भारत की संसद पर हमले को अंजाम दिया था, उसके बाद पठानकोट और उड़ी हमले की साजिश भी उसी ने रची और उसके संगठन जैश ने ही इन हमलों को अंजाम दिया। वह पाक अधिकृत कश्मीर की राजधानी मुजफ्फराबाद सहित पाकिस्तान के शहरों में भारत के खिलाफ रैलियां निकालता रहा है और जहर उगलता रहा है। यह वही अजहर मसूद है, जिसे 1994 में श्रीनगर में गिरफ्तार किया गया था और 1999 में कंधार अपहरण कांड के बाद विमान यात्रियों की सुरक्षित रिहाई के बदले उसे भारत सरकार ने छोड़ा था। यह सब जानते हुए भी चीन अगर मसूद अजहर के साथ खड़ा है और उसे बचा रहा है तो ऐसे में भारत के साथ उसकी दोस्ती संदेह के घेरे में आ जाती है।

युवाओं को समाज और देश की उन्नति के लिए कार्य करना चाहिए : प्रो. सुधीर अवस्थी कानपुर। छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय के प्रति कुलपति प्...